देहरादून। उत्तराखंड में पहाड़ की बेटियों को बाल विवाह जैसी कुरीति से बचाने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बड़ी पहल की है। आयोग प्रदेश के 8 चिन्हित और संवेदनशील जिलों में बाल विवाह की रोकथाम के लिए विशेष अभियान चलाने जा रहा है। इस जमीनी अभियान को असरदार बनाने के उद्देश्य से आयोग ने ‘जस्ट राइज ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन’ और ‘समर्पण सोसाइटी’ के साथ एमओयू किया है।
बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना ने पहाड़ी क्षेत्रों के एक नए और चिंताजनक पहलू को उजागर किया। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए कम उम्र की लड़कियों को बेहतर जिंदगी का झांसा देकर बहलाने-फुसलाने के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। जब लड़कियां अचानक घर से गायब हो जाती हैं, तो उनके वापस लौटने पर परिवार सामाजिक लोक-लाज के दबाव में आकर कम उम्र में ही उनकी शादी कर देते हैं।
आयोग अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि बाल विवाह केवल एक सामाजिक कुरीति नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर बच्चियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पूरे भविष्य को बर्बाद करने वाला गंभीर अपराध है। कम उम्र में शादी हो जाने से लड़कियों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है, जो आगे चलकर पूरे समाज के लिए बड़ा संकट बनता है।
कम उम्र में विवाह के कारण बालिकाओं को घरेलू हिंसा, किशोरावस्था में ही असुरक्षित गर्भधारण और बीच में ही पढ़ाई छूट जाने जैसी भयानक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इससे लड़कियां कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं और जिंदगी भर दूसरों पर निर्भर रहने को मजबूर हो जाती हैं।
बाल संरक्षण आयोग का मुख्य लक्ष्य प्रदेश की हर बेटी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाना और उसे आत्मनिर्भर बनाना है। आयोग चाहता है कि राज्य की लड़कियां इतनी सक्षम बनें कि वे अपने जीवन और भविष्य के फैसले खुद ले सकें। इसी सोच के साथ राज्य सरकार और आयोग मिलकर इस अभियान को धरातल पर पूरी मजबूती से लागू करने में जुटे हैं।

