Uttarakhand: वनाग्नि पर HC की सरकार को फटकार, 10 साल में कोर्ट के निर्देशों पर कितना हुआ अमल?

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नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेश के जंगलों में लगने वाली आग पर रोक लगाने के लिए करीब एक दशक पहले जारी निर्देशों पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सरकार से पूछा है कि 10 साल बीत जाने के बाद भी कोर्ट के आदेशों पर धरातल पर कितना अमल हुआ।

हाईकोर्ट ने इस संबंध में राज्य सरकार को विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के सख्त आदेश दिए हैं। कोर्ट ने याद दिलाया कि वर्ष 2016 और 2021 में वनाग्नि की खबरों का स्वतः संज्ञान लिया गया था। यदि पूर्व आदेशों का सही से पालन होता, तो आग की घटनाओं में भारी कमी आई होती।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि वनाग्नि पर नियंत्रण के लिए हाईकोर्ट ने वन विभाग के अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की थी। राज्य सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में संशोधन करते हुए हाईकोर्ट को मामले में दोबारा सुनवाई करने के निर्देश दिए थे, जिसके तहत यह सुनवाई हुई है।

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मामले की सुनवाई के दौरान पर्यावरण मित्रों ने कोर्ट के सामने चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने बताया कि वन विभाग के पास 300 से अधिक डाक बंगले मौजूद हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर वीरान पड़े हैं। जब बुनियादी ढांचा ही उपेक्षित है, तो जंगलों की सुरक्षा कैसे होगी।

इसके अलावा, कोर्ट में जंगल के आसपास कैंप फायर और बोन फायर पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की गई। पर्यावरण मित्रों ने उदाहरण देते हुए बताया कि केवल जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास ही 100 से अधिक रिसॉर्ट्स और होम स्टे चल रहे हैं, जिससे जंगलों को खतरा रहता है।

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राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने भी वन, वन्यजीव और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने के संबंध में मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजा है। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद सरकार को जल्द से जल्द प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।