देहरादून। उत्तराखंड का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों सवालों के घेरे में है। डॉक्टरों के तबादलों से लेकर अस्पतालों की व्यवस्थाओं तक लगातार उठ रहे सवालों के बीच हाईकोर्ट की सख्ती ने भी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और तबादलों को लेकर सरकार से जवाब मांगा है, व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के निर्देश दिए हैं, लेकिन सवाल यही है कि जब सिस्टम को खबरों, शिकायतों और विरोध-प्रदर्शनों से भी फर्क न पड़े तो व्यवस्था सुधरेगी कैसे?
पिछले दिनों हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर विभागीय सिस्टम को कड़ी फटकार लगाई थी। डॉक्टरों के तबादलों और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े मामलों में दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए थे। अदालत की नाराजगी ने साफ कर दिया कि स्वास्थ्य विभाग के भीतर चल रही खींचतान और व्यवस्थागत खामियां अब सिर्फ विभागीय फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि न्यायपालिका की निगाह भी इस पर है।
तबादला नीति का मामला भी कम पेचीदा नहीं रहा। डॉक्टरों के तबादलों को लेकर विरोध, आंदोलन और धरना-प्रदर्शन तक हुए। कई स्तरों पर सवाल उठे और आखिरकार सिस्टम को कुछ मामलों में बैकफुट पर भी जाना पड़ा। लेकिन इसके बावजूद विवाद पूरी तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग में लगातार उठते सवालों का असर दिखाई क्यों नहीं देता?
अस्पतालों की व्यवस्थाएं हों, डॉक्टरों की उपलब्धता हो या तबादलों से जुड़े फैसले हर मोर्चे पर कभी कर्मचारी सवाल उठाते हैं तो कभी आम लोग। मीडिया के जरिए भी व्यवस्थाओं की तस्वीर सामने आती रहती है, लेकिन ऐसा लगता है मानो सिस्टम ने इन खबरों को संज्ञान लेने की जरूरत ही समझनी बंद कर दी हो।
स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील व्यवस्था में अधिकारियों की जवाबदेही सबसे ज्यादा मायने रखती है। क्योंकि किसी फाइल के अटकने का असर सिर्फ कागज पर नहीं पड़ता, बल्कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीज और उनके परिजन उसे भुगतते हैं।
हाईकोर्ट की फटकार के बाद अब देखना होगा कि विभाग कागजी जवाब दाखिल करता है या वास्तव में व्यवस्थाओं को सुधारने की दिशा में ठोस कदम भी उठाता है। फिलहाल सवाल एक ही है—जब हाईकोर्ट तक नाराज है, तो स्वास्थ्य विभाग आखिर कब जागेगा ?

