उत्तराखंड में 25 साल में 46,203 हेक्टेयर जंगल तबाह, प्रतिपूरक वनीकरण पर RTI में बड़ा खुलासा

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देहरादून। उत्तराखंड में विकास की आड़ में जंगलों के विनाश और उससे होने वाली सरकारी कमाई को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सरकारी आंकड़ों और आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, राज्य में हर साल औसतन 28 हजार से अधिक पेड़ों की छांव हमेशा के लिए खत्म हो रही है। इस अंधाधुंध कटान से वन निगम हर साल करीब 450 करोड़ रुपये का भारी-भरकम राजस्व बटोर रहा है, लेकिन राज्य का पर्यावरण आईसीयू में पहुंच रहा है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा खुलासा सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल की आरटीआई रिपोर्ट से हुआ है। आरटीआई के जवाब से साफ हुआ है कि उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों के भीतर कुल 46,203 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वानिकी यानी विकास कार्यों के लिए डायवर्ट कर दिया गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राज्य के इस कुल वन भूमि डायवर्जन का आधा बोझ अकेले राजधानी देहरादून को उठाना पड़ा है, जहां कंक्रीट का जंगल बढ़ता जा रहा है।

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आरटीआई के जवाब ने वन विभाग की मंशा और पारदर्शिता पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अनूप नौटियाल ने बताया कि सरकार ने वन भूमि डायवर्जन का विस्तृत विवरण तो दे दिया, लेकिन इसके बदले होने वाले प्रतिपूरक वनीकरण की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब हजारों हेक्टेयर वन भूमि उजाड़ी जा रही है, तो जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि इसके बदले में नए पेड़ कहां और कब लगाए गए और उनकी निगरानी की क्या व्यवस्था है।

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सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, केवल पिछले छह साल की अवधि में ही प्रदेश के जंगलों से 255219 घन मीटर से अधिक लकड़ी निकाली गई है। वन विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर एक पेड़ से औसतन डेढ़ घन मीटर लकड़ी निकलती है, तो छह साल में 1 लाख 70 हजार से ज्यादा पेड़ नियमित कटान और प्राकृतिक कारणों से काटकर बेच दिए गए। यही वजह है कि माइनिंग और लकड़ी की बिक्री अब वन निगम की आय का मुख्य जरिया बन चुकी है।

एक तरफ जहां वैध कटान से जंगल खाली हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तस्करों की निगाहें भी उत्तराखंड के जंगलों पर टिकी हुई हैं। राज्य के वनों में मौजूद साल, शीशम, सागौन, खैर, चीड़ और देवदार जैसी बेशकीमती लकड़ियों के लिए तस्कर लगातार जाल बिछा रहे हैं। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2009-10 से 2023-24 के बीच राज्य में पेड़ों के अवैध पातन के 19,744 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जो सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलते हैं।

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हालांकि, वन विभाग कागजों पर हर साल मानसून में बड़े पैमाने पर पौधारोपण का दावा करता है। विभाग के ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1992 से लेकर 2023-24 तक राज्य की 6,91,271 हेक्टेयर वन भूमि पर पौधारोपण किया जा चुका है। लेकिन जमीनी हकीकत और आरटीआई में प्रतिपूरक वनीकरण की जानकारी छुपाए जाने के बाद अब इन सरकारी दावों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

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