उत्तराखंड की 4 खतरनाक झीलों पर जल्द लगेगा ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’, 1,335 झीलें बनीं बड़ा खतरा

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देहरादून। केदारनाथ और चमोली जैसी विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेल चुके उत्तराखंड में 13 खतरनाक हिमनद झीलों को चिह्नित किया गया है। ये झीलें भविष्य में किसी भी समय बड़ी तबाही का कारण बन सकती हैं। उत्तराखंड अंतरिक्ष केंद्र सैटेलाइट और ड्रोन तकनीक के माध्यम से इन सभी संवेदनशील झीलों की पैनी निगरानी कर रहा है।

यूफैक की वैज्ञानिक डॉ. आशा थपलियाल ने बताया कि निगरानी के दौरान इन झीलों के आकार में कुछ प्राकृतिक परिवर्तन दर्ज किए गए हैं। इन बदलावों की अद्यतन रिपोर्ट तुरंत राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भेज दी गई है। वर्तमान में वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, आपदा प्रबंधन और संबंधित विभागों की संयुक्त टीम झीलों की हर हलचल पर नजर बनाए हुए है।

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आपदा के जोखिम को कम करने के लिए उत्तराखंड की 4 अति-संवेदनशील झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन पूरा कर लिया गया है। अब यहाँ ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ स्थापित करने की तैयारी चल रही है। इस सिस्टम को धरातल पर लगाने और संचालित करने की जिम्मेदारी वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान को सौंपी गई है।

राष्ट्रीय स्तर पर सुदूर संवेदन केंद्र देश भर की 28,043 हिमनद झीलों की पहचान कर उनकी मॉनिटरिंग कर रहा है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और राज्य सरकारें मिलकर इन झीलों से पैदा होने वाले जल-प्रलय के खतरे को कम करने में जुटी हैं।

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दूसरी ओर, ट्रांस-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बन रही झीलें हिमाचल प्रदेश, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा खतरा बन रही हैं। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के ताजा अध्ययन के अनुसार, अकेले सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियर झीलें सामने आई हैं।

अध्ययन के मुताबिक, सतलुज बेसिन की 2,292 झीलों में से 1,335 झीलें चीन के कब्जे वाले तिब्बत क्षेत्र में स्थित हैं। इसके अलावा 470 झीलें स्पीति और 487 झीलें किन्नौर के खाब से नीचे हिमाचल के सतलुज क्षेत्र में मौजूद हैं, जिनमें से 49 झीलें 10 हेक्टेयर से अधिक बड़े क्षेत्रफल में फैली हैं।

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विशेषज्ञों के अनुसार, चिनाब और रावी बेसिन में भी 373 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। तिब्बत में किसी भी झील के अचानक टूटने पर उसका पानी सीधे सतलुज नदी के रास्ते हिमाचल में प्रवेश करेगा। इसका विनाशकारी असर पंजाब के मैदानी इलाकों तक देखने को मिल सकता है।

हिमालयी क्षेत्रों में लगातार टूट रहे ग्लेशियरों के कारण झीलों के फटने का खतरा पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। केदारनाथ और चमोली जैसी आपदाओं के पीछे एक जैसा ही भौगोलिक पैटर्न रहा है, जिसे देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें सैटेलाइट, ड्रोन और अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए इस संभावित खतरे को टालने में जुटी हैं।

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