त्रिवेंद्र सिंह रावत का आह्वान: हिमालयी राज्यों में आपदा से निपटने के लिए बनेगा मास्टर प्लान

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देहरादून के वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान में ‘पृथ्वी दिवस’ के अवसर पर आयोजित एक संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों पर गंभीर चर्चा की। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य डॉ. विनोद असवाल ने जोर देकर कहा कि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल और उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ एक जैसी हैं, इसलिए इन राज्यों के संस्थानों और संसाधनों को अब अलग-अलग के बजाय एकीकृत तौर पर काम करना चाहिए। इससे भूस्खलन और ग्लेशियर फटने जैसी आपदाओं का बेहतर अध्ययन और समाधान संभव हो सकेगा।

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इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक शोध का तालमेल: त्रिवेंद्र सिंह रावत

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि मानव जनित आपदाओं को केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और सटीक वैज्ञानिक शोध के तालमेल से ही रोका जा सकता है। उन्होंने विकास, कृषि और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि ‘देवभूमि विकास संस्थान’ पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और नदियों के पुनर्जीवन जैसे सामाजिक कार्यों के लिए निरंतर प्रयासरत है।

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रिमोट सेंसिंग से संवेदनशील जगहों की पहचान: डॉ. प्रकाश चौहान

नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (ISRO), हैदराबाद के निदेशक डॉ. प्रकाश चौहान ने जलवायु परिवर्तन के खतरों की ओर इशारा करते हुए कहा कि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। उन्होंने बताया कि रिमोट सेंसिंग तकनीक के माध्यम से उन खतरनाक और संवेदनशील जगहों को चिह्नित किया जा रहा है जहाँ आपदा आने की संभावना सबसे अधिक है। उन्होंने पूरे हिमालयी क्षेत्र की निरंतर ‘रिमोट सेंसिंग मॉनिटरिंग’ की जरूरत बताई।

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‘हिम शक्ति मॉडल’ की अवधारणा

संगोष्ठी के दौरान विशेषज्ञों ने ‘हिम शक्ति मॉडल’ का विचार रखा। इसके तहत वाडिया संस्थान, FRI (वन अनुसंधान संस्थान) और NRSA जैसे प्रमुख संस्थानों को मिलकर अगले कुछ वर्षों तक एक साझा प्लेटफॉर्म पर काम करने का सुझाव दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि संसाधनों के एकीकरण से आपदा प्रबंधन की लागत कम होगी और परिणाम अधिक प्रभावी होंगे।

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