देहरादून। जमाखोरी और कालाबाजारी पर विभागों की पैनी नजर होने के दावे राजधानी देहरादून में एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। कभी चीनी की किल्लत और बढ़ी कीमतों को लेकर लोगों की जेब पर असर पड़ा तो अब अमूल मक्खन को लेकर बाजार में मनमानी का मामला सामने आया है।
दावा है कि पिछले करीब 20 दिनों से अमूल का मक्खन कंपनी की ओर से देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। ऐसे में बाजार में इसकी कमी का फायदा उठाकर कुछ कारोबारी कथित तौर पर ग्राहकों से निर्धारित मूल्य से अधिक रकम वसूल रहे हैं।
स्थिति यह है कि जिस अमूल मक्खन के पैकेट पर ₹285 का मूल्य प्रिंट है, उसे कुछ दुकानों पर कथित तौर पर ₹315 तक में बेचा जा रहा है। यानी एक पैकेट पर सीधे 30 रुपये तक अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि ग्राहक अगर पैकेट पर दर्ज कीमत दिखाकर अधिक रकम लिए जाने पर सवाल उठाते हैं तो आरोप है कि कुछ दुकानदार सामान देने से ही इनकार कर देते हैं।
राजधानी में मक्खन की आपूर्ति प्रभावित होने की बात सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बाजार में उपलब्ध सीमित स्टॉक की निगरानी कौन कर रहा है? अगर किसी उत्पाद की आपूर्ति में वास्तव में कमी है तो इसका मतलब यह नहीं कि दुकानदार अपनी मर्जी से उसकी कीमत तय करने लगें। एमआरपी से अधिक कीमत वसूलने का अधिकार किसी कारोबारी को नहीं है।
जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए प्रशासन और संबंधित विभाग समय-समय पर अभियान चलाते हैं। दुकानों का निरीक्षण किया जाता है, स्टॉक की जांच की जाती है और कारोबारियों को निर्धारित दरों पर सामान बेचने के निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन अगर राजधानी में ही ₹285 का उत्पाद ₹315 तक में बिक रहा है, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि निगरानी तंत्र जमीन पर कितना प्रभावी है?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सिर्फ 30 रुपये के अतिरिक्त भुगतान का मामला नहीं है। मामला उस बाजार व्यवस्था का है, जहां कमी का फायदा उठाकर ग्राहक की मजबूरी को मुनाफे का जरिया बनाया जा रहा है। अब देखना होगा कि अमूल मक्खन की आपूर्ति में आई कथित कमी और उसके नाम पर हो रही अतिरिक्त वसूली की शिकायतों पर संबंधित विभाग क्या कार्रवाई करता है।
क्या दुकानों पर छापेमारी होगी? क्या स्टॉक की जांच की जाएगी? और अगर एमआरपी से अधिक कीमत पर बिक्री की पुष्टि होती है तो क्या जिम्मेदार कारोबारियों पर कार्रवाई होगी? क्योंकि सवाल सीधा है अगर पैकेट पर कीमत ₹285 लिखी है तो ग्राहक से ₹315 वसूलने की इजाजत आखिर किसने दी?

