देहरादून में रसूखदारों के आगे बेबस हुई ‘तीसरी आंख’, आम जनता पर चालान की मार

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देहरादून की सड़कों पर लगे हाई-टेक स्मार्ट कैमरे आम नागरिकों की छोटी सी चूक पर भी तुरंत हरकत में आ जाते हैं और पलक झपकते ही मोबाइल पर चालान का मैसेज भेज देते हैं, लेकिन रसूखदारों के लिए यह सिस्टम पूरी तरह मौन नजर आता है। शहर में एक तरफ जहां आम आदमी को नियमों के पालन के लिए मजबूर किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सफेद नंबर प्लेट वाली टैक्सी गाड़ियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के वाहनों द्वारा सरेआम नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है। आलम यह है कि जो कैमरे परिंदों पर भी नजर रखने का दावा करते हैं, वे नेताओं और अधिकारियों की गाड़ियों के गलत नंबर प्लेट और नियमों की अनदेखी को पहचानकर भी उन पर कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

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स्मार्ट कैमरों की कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल

शहर के प्रमुख चौराहों और सीमाओं पर लगे एएनपीआर (ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन) कैमरों के डेटा सर्वर में वीआईपी कल्चर को दर्शाने वाली गाड़ियों का रिकॉर्ड तो दर्ज होता है, लेकिन कंट्रोल रूम में बैठे अधिकारियों की चुप्पी हैरान करने वाली है। आम जनता के मन में अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या स्मार्ट सिटी के इन आधुनिक कैमरों का डिजाइन केवल मध्यम वर्ग और सामान्य नागरिकों की जेब ढीली करने के लिए ही तैयार किया गया है। यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था तकनीक की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाती है कि आखिर रसूख के आगे नियमों की डोरी इतनी ढीली क्यों पड़ जाती है।

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रसूख के आगे बेबस होता प्रशासनिक तंत्र

जब बात किसी प्रभावशाली नेता या बड़े अधिकारी के वाहन की आती है, तो प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह बेबस दिखाई देता है। सड़कों पर दौड़ती सफेद नंबर प्लेट वाली टैक्सी गाड़ियां व्यावसायिक नियमों के विरुद्ध होने के बावजूद इन कैमरों की नजर से बची रहती हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि शहर की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के लिए लगाई गई ‘तीसरी आंख’ जानबूझकर रसूखदारों के सामने अपनी पलकें झपका लेती है। नियमों का यह दोहरा मापदंड न केवल कानून के शासन को कमजोर करता है बल्कि आम जनता के बीच प्रशासन की छवि को भी धूमिल कर रहा है।