शासन के अधिकारी से लेकर विभागीय अधिकारियो में मची होड…जनसेवा की आड़ में ‘जेबसेवा’ का खेल….!

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देहरादून: उत्तराखंड में कुछ अधिकारियों की कार्यशैली इन दिनों सवालों के घेरे में है। सरकारी दफ्तरों में जनता की सेवा करने के बजाय कुछ अफसर मानो “परचून की दुकान” चलाने में जुटे हों। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि विभागों में कामकाज से ज्यादा लेनदेन और सेटिंग की चर्चाएं सुनाई देने लगी हैं। आरोप हैं कि कुछ अधिकारी सरकारी जिम्मेदारियों को किनारे रखकर अपनी जेब गर्म करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक एक विभाग में इन दिनों टेंडर प्रक्रिया को लेकर अंदरखाने जबरदस्त खेल चल रहा है। चर्चा है कि व्यवस्थाओं के नाम पर मोटे लेनदेन की बातें सामने आ रही हैं। आरोप यह भी हैं कि पहले टेंडर प्रक्रिया में खेल किया जाता है और फिर बिल भुगतान के दौरान वसूली का अलग सिस्टम चलता है। यही वजह है कि अब पूरे मामले को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

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सरकारी गलियारों में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि कुछ अधिकारी नियम-कायदों को दरकिनार कर अपने चहेते लोगों को फायदा पहुंचाने में लगे हैं। जिन कामों में “सेटिंग” हो जाती है, वहां फाइलें तेजी से आगे बढ़ती हैं, जबकि आम प्रक्रिया से गुजरने वाले लोगों को महीनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं। इससे न सिर्फ सरकारी व्यवस्था की छवि खराब हो रही है बल्कि सरकार की सख्त भ्रष्टाचार विरोधी नीति को भी कुछ अधिकारी ठेंगा दिखा रहे है।।

मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami लगातार जीरो टॉलरेंस की नीति को लेकर सख्त रुख अपनाते रहे हैं। मुख्यमंत्री कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। धामी सरकार ने पूर्व में कई अधिकारियों पर कार्रवाई कर उन्हें सलाखों तक पहुंचाने का काम भी किया है। बावजूद इसके कुछ अधिकारी शायद यह मान बैठे हैं कि सिस्टम को गुमराह कर सबकुछ दबाया जा सकता है। अब इस पूरे मामले में एक कथित ऑडियो भी चर्चा का विषय बना हुआ है। बताया जा रहा है कि इस ऑडियो में लेनदेन और भुगतान से जुड़ी बातचीत सुनाई दे रही है। हालांकि इस ऑडियो की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसके सामने आने के बाद विभागीय हलकों में हड़कंप मचा हुआ है। अगर इस ऑडियो की गंभीरता से पड़ताल हुई तो कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं।

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राजनीतिक और प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार पर कितनी भी नकेल कस दी जाए, लेकिन कुछ अधिकारी अपनी आदतों से बाज नहीं आते। यही वजह है कि पूरे सिस्टम की साख पर असर पड़ता है। जनता के बीच भी अब यह सवाल उठने लगा है कि आखिर सरकारी टेंडर प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और उसमें किस स्तर तक खेल हो रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई करेगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। क्योंकि जिस तरह से टेंडर और भुगतान में कथित खेल की चर्चाएं सामने आ रही हैं, उसने सिस्टम की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जीरो टॉलरेंस नीति की सरकार इस मामले में कितना बड़ा एक्शन लेती है।