सुप्रीम कोर्ट की आरक्षण पर बड़ी टिप्पणी: संपन्न और उन्नत परिवारों के बच्चे स्वेच्छा से आएं बाहर

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सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों के भीतर आर्थिक और शैक्षिक रूप से मजबूत हो चुके परिवारों को आरक्षण का लाभ दिए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जब माता-पिता दोनों या उनमें से कोई एक IAS अधिकारी बन जाता है, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक और आर्थिक सबलीकरण का मुख्य उद्देश्य समाज में सामाजिक गतिशीलता लाना है, लेकिन अगर सक्षम होने के बाद भी पीढ़ियों तक आरक्षण की मांग की जाती रही, तो देश इस व्यवस्था से कभी बाहर नहीं निकल पाएगा। अदालत का मानना है कि जो परिवार आरक्षण की मदद से सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें अब धीरे-धीरे इस व्यवस्था को छोड़ देना चाहिए ताकि इसका लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच सके।

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यह पूरा विवाद कर्नाटक के एक उम्मीदवार से जुड़ा हुआ है, जिसका चयन कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड में आरक्षित श्रेणी के तहत सहायक अभियंता के पद पर हुआ था। हालांकि, जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने गहन जांच के बाद उसे जाति वैधता प्रमाण पत्र देने से साफ इनकार कर दिया, क्योंकि उसके माता-पिता सरकारी कर्मचारी हैं और उनकी संयुक्त आय निर्धारित सीमा से काफी अधिक है। समिति ने उम्मीदवार को ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे में मानते हुए उसे आरक्षण का लाभ देने के अयोग्य ठहराया, जिसके बाद यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया।

क्रीमी लेयर सिद्धांत का इतिहास

देश में ओबीसी (OBC) वर्ग के लिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत साल 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी (मंडल) फैसले के बाद लागू हुआ था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 27 फीसदी आरक्षण को बरकरार रखते हुए संपन्न लोगों को इससे बाहर रखने को कहा था।

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वर्तमान नियमों के मुताबिक ओबीसी परिवारों के लिए क्रीमी लेयर की सालाना आय सीमा 8 लाख रुपये निर्धारित है, लेकिन उच्च पदस्थ संवैधानिक अधिकारियों, वरिष्ठ नौकरशाहों और सेना के शीर्ष अधिकारियों के बच्चों को आय की परवाह किए बिना सीधे इस श्रेणी से बाहर रखा जाता है। इसी साल मार्च में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में जोर दिया था कि केवल माता-पिता की आय ही क्रीमी लेयर का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती, बल्कि उनके काम की स्थिति और सामाजिक श्रेणी पर भी विचार किया जाना जरूरी है।

EWS और क्रीमी लेयर में अंतर

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील शशांक रतनू ने दलील दी कि क्रीमी लेयर का निर्धारण सिर्फ आय नहीं, बल्कि पद और सामाजिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और क्रीमी लेयर के बीच एक स्पष्ट अंतर है, क्योंकि ईडब्ल्यूएस का आधार केवल आर्थिक कमजोरी है, जबकि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन एक अलग विषय है।

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अदालत ने माना कि जब कोई परिवार आरक्षण का लाभ लेकर एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाता है, तो सामाजिक संतुलन बनाए रखना जरूरी हो जाता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, जिससे देश में संपन्न परिवारों को आरक्षण मिलने या न मिलने को लेकर एक नई कानूनी और सामाजिक बहस तेज हो गई है।

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