नफरती भाषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा-निपटने के लिए वर्तमान कानून ही पर्याप्त

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सुप्रीम कोर्ट ने नफरती भाषण और अफवाह फैलाने को समाज के लिए एक गंभीर खतरा बताया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए देश में पहले से ही पर्याप्त कानून मौजूद हैं, इसलिए नए दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने जोर देकर कहा कि असली चुनौती कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनका सही तरीके से पालन सुनिश्चित करना है।

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कानून बनाना संसद का काम, अदालत का नहीं

  • अदालत ने साफ किया कि नए आपराधिक कानून बनाना न्यायपालिका का काम नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी संसद और विधानसभाओं की है।
  • कोर्ट मौजूदा कानूनों की व्याख्या कर सकता है और उनका पालन सुनिश्चित करा सकता है, लेकिन वह सरकार को नया कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
  • हालांकि, सरकार और विधायिका समय के साथ बदलते हालात को देखते हुए खुद नए नियमों पर विचार कर सकते हैं।
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FIR दर्ज न होने पर पीड़ित के पास विकल्प

  • सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि यदि पुलिस किसी मामले में FIR दर्ज नहीं करती है, तो पीड़ित व्यक्ति के पास कई कानूनी रास्ते खुले हैं।
  • प्रभावित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक (SP) के पास शिकायत कर सकता है या सीधे मजिस्ट्रेट से कार्रवाई की मांग कर सकता है।
  • मजिस्ट्रेट के पास मामले की जांच के आदेश देने का पूरा अधिकार होता है।
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मौजूदा कानूनी प्रावधान और समाज पर असर

  • अदालत के अनुसार, ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023’ और पुरानी ‘दंड प्रक्रिया संहिता’ में नफरती भाषणों से निपटने के पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं।
  • पीठ ने चिंता व्यक्त की कि ऐसे भाषणों से समाज का भाईचारा, सम्मान और संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित होती है।
  • यह भी दोहराया गया कि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस के लिए FIR दर्ज करना अनिवार्य है।