मद्रास हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि सरकार अपने कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश का लाभ देने में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं कर सकती है। कोर्ट के अनुसार, यह नियम तीसरी गर्भावस्था के मामले में भी समान रूप से लागू होता है। जस्टिस आर सुरेश कुमार और जस्टिस एन सेंथिल कुमार की पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि मातृत्व अधिकारों में समानता सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसे किसी भी आधार पर नकारा नहीं जा सकता।
जिला जज का पिछला आदेश रद्द
- हाईकोर्ट ने विल्लुप्पुरम के प्रधान जिला जज के उस पुराने आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसमें एक याचिकाकर्ता के मातृत्व अवकाश के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था।
- याचिकाकर्ता शायी निशा ने 2 फरवरी से अगले साल 1 फरवरी तक के लिए अवकाश मांगा था, जिसे पहले मना कर दिया गया था।
- अदालत ने अब जिला न्यायाधीश को निर्देश दिया है कि वे एक सप्ताह के भीतर इस पर पुनर्विचार करें।
तीसरी गर्भावस्था के लिए भी समान अधिकार
- कोर्ट ने निर्देश दिया कि भले ही सरकारी आदेशों में तीसरी गर्भावस्था के लिए अवकाश की सीमा 12 सप्ताह तक सीमित की गई हो, लेकिन कर्मचारी को पहली और दूसरी गर्भावस्था के समान ही पूरा अवकाश दिया जाना चाहिए।
- अदालत ने तर्क दिया कि अवकाश पर लगाया गया ऐसा कोई भी प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 162 के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विपरीत है।
- अदालत का मानना है कि मातृत्व के लाभों को सीमित करना स्वीकार्य नहीं है।
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