सरकारी स्कूलों में सन्नाटा, प्राइवेट में डाका, 4745 प्रवक्ताओं के पद खाली और सिस्टम खामोश’

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उत्तराखंड में सरकारी तालीम की सेहत दुरुस्त नहीं है..जबकि निजी स्कूलों में तालीम का धंधा मुनाफे का कारोबार बना हुआ है। अभिभावकों को कही से भी राहत नहीं है। निजी स्कूल लूट रहे हैं जबकि सरकारी स्कूल में तालीम की कमर टूटी हुई है। तमाशे सा मंजर है बावजूद इसके जिम्मेदार खामोश हैं।

सरकारी स्कूलों में धीरे-धीरे सन्नाटा पसर रहा है..लेकिन सिस्टम में कोई हरकत नहीं। ये इसलिए कहा जा रहा है सरकारी तालीम जनता का विश्वास खो चुकी है नतीजा ये है कि प्राइमरी स्कूल, छात्रों की कम संख्या के चलते धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं। जबकि माध्यमिक शिक्षा का हाल ये है कि वहां मास्साब ही नहीं हैं। मतलब जहां सोना है वहां नाक नहीं और जहां नाक है वहां सोना नहीं।

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मीडिया रिपोर्ट और RTI से मिली सूचना बता रही है कि मास्टर जी की तैनाती न होने के चलते माध्यमिक शिक्षा की तस्वीर प्रदेश में डरावनी हो गई है। आलम ये है कि राज्य में 4745 प्रवक्ताओं के खाली पद गुरू जी की बाट जोह रहे हैं लेकिन सिस्टम कुंभकर्णी नींद में सोया पड़ा है। न सामान्य शाखा के 4261 पदों पर तैनाती हुई है न महिला शाखा के 848 पदों पर मैम तैनात हुई हैं..सब कुछ रामभंरोसे चल रहा है।

मस्ती में हजूर, आभिभावक मजबूर की तर्ज वाली तस्वीर मे सबसे डार्क शेड भाषाओं का हैं, हिंदी विषय में 590 पद और अंग्रेजी भाषा में 586 पद खाली हैं। नागरिकशास्त्र 549 और अर्थशास्त्र के 543 पद खाली हैं। साइंस सेक्सन को भी प्रवक्ताओँ की दरकार है। भौतिक विज्ञान 389, रसायन शास्त्र 462 और जीवविज्ञान में 382 पद खाली हैं।

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कुछ ऐसा ही आलम गणित विषय का है जहां 266 प्रवक्ताओं का टोटा है. इतिहास विषय को भी 212 प्रवक्ता चाहिए, संस्कृत को 301 और भूगोल विषय के लिए 283 मास्टर चाहिए। समाज शास्त्र हों या कुछ और दूसरे विषय या फिर प्रधानाचार्यों की तैनाती हर मसले पर शिक्षा विभाग ने आंखें बंद की हुई हैं।

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जरा सोचिए उस आदमी के साथ ये कितना अन्याय है, जिसके बच्चों का भविष्य सरकारी स्कूलों ने ही संवारना है। जिसकी माली हालत इतनी मजबूत नहीं कि वो कसाईखाने जैसे बन चुके निजी स्कूलो में बच्चों की तालीम के खातिर अपने आपको गिरवी रख सके।अपने जरूरी कामों के लिए तय रकम को हलाल करवा सके।

कितनी अजीब बात है समाज के जिस आखिरी आदमी के हितों की दुहाई दी जाती है, जिसके विकास के लिए चुनावी घोषणा पत्र तैयार किया जाता है।उसी तबके के बच्चों के ख्वाब, मास्टर जी के आभाव में फ़ना हो रहे हैं। जिम्मेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में तालीम नहीं लेते।