एक साथ तीन तलाक को आलिमों ने बताया ‘गुनाह-ए-अजीम’, जानिए इस्लाम और शरीयत में क्या है हकीकत

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उत्तराखंड यूसीसी को लागू करने वाला देश का पहला प्रदेश बना है तो बीते हफ्ते रुड़की में समान नागरिक संहिता के तहत हलाला का पहला मुकद्दमा भी दर्ज हुआ है। केंद्र और राज्य सरकार इन कुप्रथाओं के खिलाफ कड़े कदम उठा रही हैं। इन्हें रोकने के लिए कानून को भी मजबूत किया गया है। बावजूद इसके एक तबका है जो अभी भी ऐसी कुप्रथाओं को जिंदा रखने की कवायद में जुटा है।

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बहरहाल केस दर्ज होने के बाद निकाह हलाल और तीन तलाक को लेकर चौक-चौराहों चर्चा और सोशल मीडिया में फिर से बहस होने लगी है। हालांकि हालांकि सुनी-सुनाई बातों को आधार बनाकर मजहब का मज़ाक बनता जा रहा है।

हालांकि इस्लाम को मानने वाले ज्यादातर लोग भी तीन तलाक और निकाह हलाला की हकीकत से वाकिफ़ नहीं है। ऐसे लोग इस सामाजिक बुराई को कुप्रथा नहीं मानते और मजहब से जोड़ कर देखते हैं जबकि इस्लाम और शरीयत के आलिम ‘तीन तलाक’को बड़ा गुनाह और योजनाबद्ध ‘हलाला’ को हराम करार देते हैं।

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देहरादून के शहर काजी, मुफ्ती हशीम कहते हैं “निकाह जैसे पाक साफ सामाजिक और मजहबी अनुबंध को गुस्से में तीन शब्दों को साथ खत्म करना शरीयत के खिलाफ है, जबकि तथाकथित हलाला नजायज और गुनाह-ए-आजीम है”

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शहर मुफ्ती सलीम अहमद कासमी, इस्लाम का हवाला देते हुए कहते हैं “इस्लाम ने औरत को इज्जत,फर्ज और हक दिए हैं। पैगंबर साहब ने एक साथ तीन तलाक को सख्त नापसंद फरमाया है।तीन तलाक का सल्यूशन हलाला जैसी मकरूह रस्म को अपनाना इस्लाम की तौहीन करना है।”

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