सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और समानता की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बेटियों का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार किसी भी पुराने पारिवारिक बंटवारे के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कर्नाटक के एक पारिवारिक संपत्ति विवाद की सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी कि यदि किसी पिता की मृत्यु बिना वसीयत बनाए हो जाती है, तो उनकी बेटी को क्लास-1 वारिस के रूप में संपत्ति में बेटों के समान ही पूर्ण बराबरी का हिस्सा मिलेगा, चाहे बेटों के बीच पहले ही कोई आपसी बंटवारा क्यों न हो चुका हो।
शीर्ष अदालत ने दृढ़ता से कहा कि केवल बेटों के बीच आपस में किया गया कोई भी विभाजन या समझौता, पिता की संपत्ति में बेटियों के कानूनी उत्तराधिकार और अधिकारों को किसी भी स्थिति में प्रभावित या निरस्त नहीं कर सकता क्योंकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटियों का यह अधिकार कानूनी रूप से निरंतर लागू रहता है।
कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने ठहराया गलत
इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं पर रोशनी डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस पुराने निर्णय को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसके तहत बेटियों के मुकदमे को सिर्फ इसलिए बंद कर दिया गया था क्योंकि प्रतिवादियों ने दलील दी थी कि साल 2000 का एक आपसी पारिवारिक विभाजन वर्ष 2004 से पहले ही संपन्न हो चुका था। प्रतिवादियों का कहना था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(5) के तहत यह पुराना बंटवारा पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया।
शीर्ष अदालत ने साफ किया कि इस बात की गहन कानूनी और तथ्यात्मक जांच होनी चाहिए कि क्या वह पुराना बंटवारा वाकई वैध था और क्या वह कानूनन बेटियों पर लागू होता है; इस प्रकार के जटिल विवादों का निपटारा ट्रायल के दौरान कोर्ट में पेश किए गए ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए, जिसके लिए सर्वोच्च अदालत ने मामले को वापस निचली अदालत में भेजते हुए निर्देश दिया है कि संपत्ति की वर्तमान स्थिति में बिना अनुमति कोई बदलाव न किया जाए।

