मंत्री, विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री और राजनीतिक संगठनों के नेताओं के सिफारशी पत्रों की भरमार… तबादला नीति के नियम रहे कागजों तक सीमित, RTI के खुलासे से सिस्टम की खुली परतें।
देहरादून। उत्तराखंड में तबादला नीति क्या सिर्फ सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए बनाई गई है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए दस्तावेजों ने उस व्यवस्था की परतें उधेड़ दी हैं, जिसे सरकार पारदर्शी और निष्पक्ष बताती रही है। नियमों में साफ लिखा है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपने तबादले के लिए राजनीतिक दबाव डलवाने का प्रयास करेगा तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है।
स्वास्थ्य विभाग में हुए हालिया तबादलों के दौरान स्वास्थ्य महानिदेशालय तक मंत्री, विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री, राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों और विभिन्न जनप्रतिनिधियों के सिफारशी पत्रों का अंबार पहुंचा। इनमें कई कर्मचारियों को मनचाही पोस्टिंग मिल गई, जबकि कई ऐसे भी रहे जिनकी सिफारिशें फाइलों में ही दबी रह गईं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तबादला नीति स्वयं राजनीतिक दबाव को अनुशासनहीनता मानती है तो फिर इन सिफारशी पत्रों को स्वीकार क्यों किया गया?
दरअसल, 6 फरवरी 2018 को लागू की गई उत्तराखंड की तबादला नीति में स्थानांतरण के लिए कई स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। नीति में सुगम और दुर्गम क्षेत्र का संतुलन, मेडिकल ग्राउंड, माता-पिता पर निर्भरता, मानसिक रूप से दिव्यांग अथवा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के माता-पिता, पति-पत्नी दोनों के सरकारी सेवा में होने की स्थिति, एकमात्र दिव्यांग पुत्र या पुत्री, विधवा एवं विधुर कार्मिक, न्यायालय से घोषित तलाकशुदा कर्मचारी, वरिष्ठ कार्मिक तथा अन्य मानवीय आधारों पर स्थानांतरण के विस्तृत प्रावधान शामिल हैं। यानी सरकार ने यह व्यवस्था बनाई थी कि पात्रता और आवश्यकता के आधार पर तबादले होंगे, न कि राजनीतिक पहुंच के आधार पर।
लेकिन इसी नीति के बिंदु संख्या-24 के खंड-2 में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि कोई सरकारी सेवक स्थानांतरण आदेश के विरुद्ध या अपने पक्ष में राजनीतिक अथवा अन्य प्रकार का दबाव डलवाने का प्रयास करता है तो इसे उत्तराखंड सरकारी सेवक आचरण नियमावली का उल्लंघन माना जाएगा और उसके विरुद्ध उत्तराखंड सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 2003 के तहत कार्रवाई की जाएगी। सवाल यह है कि जब नियम इतने स्पष्ट हैं तो फिर राजनीतिक सिफारिशों के आधार पर फाइलें कैसे आगे बढ़ीं? क्या किसी कर्मचारी के खिलाफ इस प्रावधान के तहत कार्रवाई हुई? यदि नहीं, तो फिर यह नियम आखिर किसके लिए बनाया गया था?
RTI से सामने आए दस्तावेजों ने इस पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेज बताते हैं कि तबादलों के लिए अलग-अलग राजनीतिक हस्तियों के सिफारशी पत्र विभाग तक पहुंचे। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि नियमों से ज्यादा असर राजनीतिक पहुंच का है। विभागीय गलियारों में भी चर्चा है कि “जिसकी चलती है, उसकी क्या गलती है।” यानी जिसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत है, उसके लिए मनचाहा तबादला और पसंदीदा तैनाती मुश्किल नहीं, जबकि नियमों के अनुसार पात्र होने के बावजूद सामान्य कर्मचारी महीनों तक आदेश का इंतजार करता रह जाता है।
स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टरों और कर्मचारियों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर असंतोष की चर्चा है। उनका कहना है कि यदि राजनीतिक सिफारिश ही अंतिम आधार बननी है तो फिर तबादला नीति बनाने का औचित्य क्या है? नियमों का पालन केवल उन्हीं कर्मचारियों के लिए क्यों हो, जिनकी कोई राजनीतिक पहुंच नहीं है? विभाग में यह भी कहा जा रहा है कि कई मामलों में पात्र कर्मचारियों की फाइलें आगे नहीं बढ़ीं, जबकि प्रभावशाली लोगों के अनुरोधों पर तेजी से निर्णय लिए गए। विडंबना यह भी है कि जिस तबादला नीति को तत्कालीन भाजपा सरकार ने पारदर्शिता और निष्पक्षता के उद्देश्य से लागू किया था, और आज भी राज्य में बीजेपी की ही सरकार है। लेकिन RTI से सामने आए तथ्य इन दावों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। यदि नियमों का पालन नहीं होना है और राजनीतिक सिफारिशें ही व्यवस्था तय करेंगी, तो फिर जीरो टॉलरेंस का संदेश कर्मचारियों तक कैसे पहुंचेगा?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी स्थानांतरण नीति की सफलता उसकी निष्पक्षता और समान रूप से लागू होने पर निर्भर करती है। यदि नियम केवल पुस्तकों तक सीमित रह जाएं और व्यवहार में राजनीतिक प्रभाव हावी हो जाए, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
अब सबसे बड़ा सवाल सरकार और स्वास्थ्य विभाग के सामने है। क्या RTI के इस खुलासे के बाद उन मामलों की समीक्षा होगी जिनमें राजनीतिक सिफारिशें लगीं? क्या तबादला नीति के बिंदु-24(2) का पालन सुनिश्चित किया जाएगा? या फिर यह नीति आगे भी केवल सरकारी फाइलों में दर्ज एक दस्तावेज बनकर रह जाएगी?
फिलहाल इतना तय है कि RTI ने तबादला व्यवस्था की वह तस्वीर सामने रख दी है, जिसने नियम और व्यवहार के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सिस्टम इन सवालों का जवाब कार्रवाई से देती है या फिर यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह समय की धूल में दबकर रह जाएगा।

