रामपुर तिराहा कांड: हथियारों की फर्जी बरामदगी में 3 पुलिसवालों को सजा

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मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत ने ऐतिहासिक रामपुर तिराहा कांड से जुड़े एक बेहद गंभीर मामले में 32 साल बाद अपना बड़ा फैसला सुना दिया है।

कोर्ट के पीठासीन अधिकारी डॉ. देवेंद्र सिंह फौजदार ने आंदोलनकारियों से फर्जी तरीके से हथियार बरामदगी दिखाने के जुर्म में झिंझाना थाने के तत्कालीन तीन पुलिसकर्मियों को डेढ़-डेढ़ साल के कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी तत्कालीन थाना प्रभारी ब्रजकिशोर, सिपाही उमेश चंद और अनिल कुमार पर डेढ़ साल जेल की सजा के साथ-साथ 21-21 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद कोर्ट ने दोषियों को फिलहाल निजी मुचलकों पर रिहा करते हुए उच्च अदालत में जमानत दाखिल करने के लिए आगामी 1 जुलाई की तारीख तय की है। यह पूरा मामला उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर 1 अक्टूबर 1994 की रात रामपुर तिराहा पर हुई बर्बरता से जुड़ा है।

घटना के अगले दिन, 2 अक्टूबर 1994 को पुलिसकर्मियों ने छपार थाना क्षेत्र के बागोवाली पुलिया के पास आंदोलनकारियों की तीन बसों की फर्जी चेकिंग दिखाई थी। तत्कालीन पुलिस टीम ने आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए उनके पास से जबरन चार तमंचे, खुकरी और भारी मात्रा में कारतूस बरामद होने का झूठा दावा किया था।

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इस फर्जीवाड़े के खिलाफ उत्तराखंड संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद उच्च न्यायालय के आदेश पर इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को दी गई। सीबीआई ने अपनी गहन जांच में पुलिस की हथियार बरामदगी को पूरी तरह फर्जी पाया और झिंझाना थाने के तत्कालीन उपनिरीक्षक ब्रज किशोर सहित चार के खिलाफ केस दर्ज किया।

सीबीआई ने इस मामले में ब्रज किशोर निवासी गाजियाबाद, सिपाही अनिल कुमार व उमेशचंद (निवासी मेरठ) और सिपाही कमल किशोर के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की थी। अदालती सुनवाई और लंबे समय तक चले ट्रायल के दौरान ही आरोपी सिपाही कमल किशोर की मौत हो गई, जिसके बाद तीन जीवित आरोपियों पर केस चलता रहा।

रामपुर तिराहा कांड के न्यायिक इतिहास में 32 साल बाद आया यह दूसरा बड़ा फैसला है, जिसने एक बार फिर तत्कालीन पुलिस व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। इससे पहले 18 मार्च 2024 को सीबीआई बनाम मिलाप सिंह के सामूहिक दुष्कर्म से जुड़े एक अन्य मामले में दो दोषियों को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

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सीबीआई ने रामपुर तिराहा कांड से जुड़े अलग-अलग मामलों में कुल 54 एफआईआर दर्ज की थीं, जिनका ट्रायल देहरादून, नैनीताल, मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर में चल रहा है। मुजफ्फरनगर में कुल सात मामलों की सुनवाई चल रही है, जिसमें एसीजेएम प्रथम की अदालत में सीबीआई बनाम राजेंद्र सिंह की पत्रावली पर अभी सुनवाई जारी है।

इस कांड के ट्रायल के दौरान ही आरोपी तत्कालीन एसओ राजबीर सिंह, पुलिसकर्मी प्रीतम सिंह, दाताराम और राजेंद्र सिंह की मौत हो जाने से तीन फाइलें बंद हो चुकी हैं। वर्तमान में मुजफ्फरनगर की जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या सात में सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी और सीबीआई बनाम एसपी मिश्रा की पत्रावली पर अदालत में बहस चल रही है।

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सीबीआई कोर्ट ने अपने 60 पन्नों के इस विस्तृत फैसले में सरकारी मशीनरी द्वारा रचे गए इस आपराधिक षड्यंत्र और राज व्यवस्था पर बेहद तल्ख और गंभीर टिप्पणियां की हैं। न्यायालय ने साफ कहा कि जब राज्य के कर्मचारी खुद निर्दोष नागरिकों को फंसाने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ते हैं, तो यह सीधे न्याय प्रणाली के विरुद्ध अपराध है।

कोर्ट ने फैसले में लिखा कि यह कृत्य केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि संपूर्ण राज्य व्यवस्था के खिलाफ है, क्योंकि राज्य का पहला दायित्व नागरिकों को कानूनी सुरक्षा देना है। सजा का एलान होने के बाद दोषी सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर ब्रज किशोर ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा कि इस लंबी कानूनी लड़ाई में विभाग के किसी बड़े अधिकारी ने उनकी सुध नहीं ली।

ब्रज किशोर ने आरोप लगाया कि तत्कालीन डीजी, डीआईजी, डीएम और एसएसपी ने उस वक्त उल्टा-सीधा काम कराकर पल्ला झाड़ लिया और उन्हें कोर्ट में अकेले लड़ने के लिए छोड़ दिया।

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