…तो यूं हुए पुष्कर धामी “धाकड़” और आलाकमान की कसौटी पर धुरंधर बन कर उभरे

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5 साल पूरे हो चुके हैं उत्तराखंड में धामी राज का इकबाल बुलंद है… 4 जुलाई 2012 को किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि भाजपा आलाकमान जिस नौजवान लड़के पुष्कर सिंह धामी पर ऐतबार कर रहा है वो न सिर्फ उनकी कसौटी पर खरा उतरेगा बल्कि दो साल बाद ही उन्हें शाबाश धामी धामी कहने पर मजबूर कर देगा।

जिस आलाकमान को देखकर दूसरे राज्यों के सीएम घबराते हैं उस आलाकमान के नेता सीएम पुष्कर सिंह धामी को धाकड़ ही नहीं धुरंधर जैसे उपनामों से भी सुशोभित कर देंगे। दरअसल नाम कमाने के लिए कुछ कर के भी दिखाना होता है। सीएम धामी अगर आज आलाकमान की नजर में या सूबे के नौजवानों की नजर में धाकड़ हैं तो उसकी वजह है।

राज्य ने अपने छब्बीस साल के इतिहास में पुष्कर सिंह धामी समेत 10 मुख्यमंत्री देखे हैं। सोचिए किसने धर्मांतरण जैसे मसले को संजीदा माना और इसे अपराध मानते हुए कानून बनाया। अब तक हुए मुख्यमंत्रियों में किसने सोचा कि, राज्य की सैकड़ों एकड़ जमीन पर मजहब की आड़ में नजायज कब्जा है और इसे छुड़ाया जाना चाहिए ताकि वो जमीन उत्तराखंड के काम आ सके।

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जिस उत्तराखंड राज्य मे राज्य बनते ही पुलिस की भर्ती सवालों के घेरे में आ गई थी। उस राज्य में अब तक किस सीएम ने सोचा, कि उन नौजवानों को उनकी मेहनत का मेहनताना मिलना चाहिए। पर ये तभी संभव होता जब प्रतियोगी परिक्षाओं का आयोजन से लेकर परिणाम तक संशय के घेरे से बाहर आती।

ये सब मुमकिन हुआ है सीएम धामी के राज में। जहां उनके कार्यकाल में बत्तीस हजार से ज्यादा नौजवान सरकारी नौकरी पा चुके हैं प्रतियोगी परिक्षाओँ के जरिए लेकिन किसी भी परीक्षा के आयोजन पर उगली नहीं उठी। समान नागरिक संहिता को लागू करने वाला राज्य उत्तराखंड बना और इसे लागू करवाने वाले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी। तभी तो भाजपा के शीर्ष नेता उन्हे धाकड़ और धुरंधर बता रहे हैं।

26 साल के इतिहास में देखा आपने कि किसी समस्या पर किसी मुख्यमंत्री ने फोन कर के शिकायतकर्ता की सुध ली हो और उसे पूछा हो कि उनकी शिकायत का समाधान हुआ या नहीं। लेकिन सीएम धामी के राज में जनता को स्वामी माना जाता है और सीएम खुद को सेवक।

तभी तो 1905 सीएम हेल्प लाइन या अपणी सरकार में पंजीकृत शिकायतों को खुद सीएम धामी मौका मिलते ही मॉनिटरिंग करते हैं। कभी कभी तो मौके पर जाकर ही शिकायतों की पड़ताल हुई है और जिम्मेदार अफसरों को तलब किया गया है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति जारी है। धामी राज में अगर तृतीय श्रेणी के कर्मचारी पर कदाचार को लेकर गाज गिरी है तो आईएस अधिकारियों को भी नहीं बख्शा गया है।

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ताजा मामला हरिद्वार भूमि घोटाले का ही है, जहां नगर निगम पर करोड़ों का चूना लगाने वाले आईएएस अफसरों पर निलंबन की गाज गिराते हुए केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भेजी गई है। आज आलम ये है कि केंद्र सरकार धामी सरकार पर पूरी तरह मेहरबान हैं। केंद्रपोषित योजनाओं में बजट की कोई किल्लत नहीं हैं। राज्य भीतर गांव, शहर या नगरो में सड़कों की कनेक्टिविटी बढ़ाने का मसला हो या संचार साधनों की हर जगह आपको मोदी-धामी की डबल इंजन की छाप दिखाई देगी।

राज्य के किसी मुख्यमंत्री ने नहीं सोचा कि धार्मिक शिक्षा ले रहे बच्चे भी तालीम की मुख्यधारा में शामिल हो कर चिकित्सक, इंजीनियर, कंप्यूटर विशेषज्ञ बन सकता है। लेकिन सीएम धामी ने न केवल सोचा बल्कि वन नेशन वन एजुकेशुन के खांचे में संस्कृत विद्यालय और मदरसो को बिठा दिया।

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ताकि आलिम फाजिल और पुरोहिताई से आगे भी जहां है ये सोचा जा सके। पहाड़ों की जमीनों को बचाने के लिए धामी राज में सख्त भू कानून बना है ताकि भूमाफिया की बेलागमी पर अंकुश लगा रहे। राज्य में उद्योंग लग रहें है स्वरोजगार बढ़ रहे हैं तीर्थाटन बढ़ रहा पर्यटन रफ्तार पकड़ रहा है। ऊर्जा के क्षेत्र में उत्तराखंड नाम कमा रहा है। धरती पुत्रो की खुशहाली के लिए होमस्टे योजना वरदान बनी हुई है।

धामी राज में बनी योजनाओं के नतीजे मिल रहे हैं जिनकी रफ्तार आने वाले वक्त में और तेज होगी। इनके अलावा और भी ऐसे काम है जो कह रहे हैं कि पुष्कर सिंह धामी यूं ही आलाकमान ने धाकड़ नहीं कहा क्योंकि वो राजकाज में धुरंधर भी साबित हो रहे हैं। मतलब साफ है सीएम धामी धाकड़ ही नहीं धुरंधर भी हैं और अब पांच साल स्थिर सरकार देकर नंबर वन सीएम भी हो गये हैं। लेकिंन गुरूर नहीं है सौम्यता बरकरार है।

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