शहरी क्षेत्रों में आग लगने की बढ़ती दुर्घटनाओं और उनसे होने वाले जान-माल के भारी नुकसान को रोकने के लिए उत्तराखंड सरकार अब फायर सुरक्षा मानकों को बेहद सख्त करने जा रही है। इसके तहत आवासीय और व्यावसायिक श्रेणी की ऊंची इमारतों के लिए नए नियम तैयार किए जा रहे हैं, जिससे फायर NOC मिलने की प्रक्रिया और उसके मानदंडों में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
केंद्र सरकार के ‘नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया’ की नई गाइडलाइंस को आधार बनाकर राज्य सरकार जल्द ही कैबिनेट में इससे जुड़ा एक प्रस्ताव लाने वाली है। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा मानकों में सुधार करना है, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी अग्निकांड की आशंका को न्यूनतम किया जा सके और नागरिक सुरक्षा को मजबूत बनाया जा सके।
कम ऊंचाई वाले भवन भी आएंगे कड़े नियमों के दायरे में
नए सुरक्षा प्रस्ताव के तहत अब कम ऊंचाई वाली इमारतों को भी कड़े सुरक्षा मानकों के दायरे में लाने की योजना बनाई गई है। वर्तमान नियमों के अनुसार, अभी केवल 12 मीटर से अधिक ऊंचे भवनों, ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं और 500 वर्गमीटर से बड़े गैर-आवासीय भूखंडों पर बने ढांचों के लिए ही फायर एनओसी अनिवार्य होती है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, नई गाइडलाइन में इस ऊंचाई की सीमा को 12 मीटर से घटाकर सीधे 9 मीटर किया जा सकता है। इस बदलाव के लागू होते ही कम ऊंचाई वाली कई अन्य इमारतें भी सीधे तौर पर फायर सुरक्षा के कड़े कानूनी दायरे में आ जाएंगी, जिससे छोटे व्यावसायिक और आवासीय परिसरों में भी सुरक्षा उपकरणों का होना अनिवार्य हो जाएगा।
बिजली लोड और वायरिंग की होगी सघन जांच
अग्निकांड के मुख्य कारणों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने तकनीकी जांच के दायरे को भी बढ़ाने का फैसला किया है। नए नियमों के अंतर्गत इमारतों में सिर्फ आग बुझाने वाले उपकरणों की उपलब्धता ही नहीं देखी जाएगी, बल्कि भवनों के बिजली लोड और उनकी वायरिंग की भी सघन जांच की जाएगी।
चूंकि अधिकांश शहरों में आग लगने की शुरुआती वजह शॉर्ट सर्किट या ओवरलोडिंग होती है, इसलिए नए मानकों में विद्युत व्यवस्था के प्रमाणीकरण को अनिवार्य हिस्सा बनाया जा रहा है। इस पूरी कवायद के जरिए सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कोई भी भवन स्वामी सुरक्षा नियमों में ढिलाई न बरत सके और हादसों पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सके।

