देहरादून। देहरादून स्थित नेहरूग्राम में क्या लोग नहीं रहते और अगर रहते हैं तो फिर ये अन्याय क्यों ? सवाल ये भी है कि क्या नेहरू ग्राम की जनता उत्तराखंड की निवासी नहीं, क्या वह देहरादून नगर निगम के लिए पार्षद नहीं चुनती, क्या वो जनता उत्तराखंड की विधानसभा के लिए विधायक नहीं चुनती ? अगर इन सवालों का जवाब हां में है तो रिंग रोड से नेहरू ग्राम की ओर जाने वाली सड़क इतनी बदहाल क्यों?
लगता है देहरादून नगर निगम में नेहरूग्राम के पार्षद,मेयर और नगर आयुक्त के साथ-साथ रायपुर विधायक उमेश शर्मा “काऊ” शायद लंबे अर्से से रिंग रोड से होते हुए नेहरूग्राम में दाखिल नहीं हुए! अगर दाखिल हुए होते तो उन्हें जरूर गड्ढों में समाई सड़क दिखाई देती या हो सकता है कि तमाम जिम्मेदार उस बदहाल सड़क से गुजरें हो लेकिन वे अपनी एयरकंडीशन वाले चार पहिया में विराजमान रहे हों लिहाजा सड़क की सूरत को दागदार बनाते गड्डे न दिखाई दिए हों।
लेकिन उन्हें देखना चाहिए था या अपने ड्राइवर से पूछना चाहिए था कि सारथी साहब गाड़ी हिचकोले क्यों ले रही है ? फिर वो बताता कि सर, सड़क लापता है और गाड़ी गड्ढों से गुजर रही है। तो क्या पता आपका दिल पसीज जाता। आप सोच पाते कि नेहरूग्राम की जनता कैसे पैदल और दोपहिया वाहनों में इस सड़क पर सफर कर रही है।
बदहाल सड़क उनका इम्तिहान ले रही है और वे जान हथेली पर रख कर अपनी वाहन चालकी की अग्निपरीक्षा दे रहे हैं। हुजूर जरा सोचिए कैसे दोपहिया चालकों को इन गड्ढ़ो को पार करने के लिए वाहन को नियंत्रित करना होता होगा। कितना साहस जुटाना होता होगा जब सामने से कोई वाहन आ जाता है। वैष्णोदेवी मंदिर से शुरू होने वाले गड्ढे पीपल चौक और इंटर कालेज जाती सड़क और नकरौंदा को जाती सड़क का पीछा नहीं छोड़ते।
आपने तो वादा किया था कि बरसात शुरू हो जाने से पहले सड़कें गड्ढा मुक्त हो जानी चाहिए लेकिन नजारा आपके सामने है सड़के गड्ढा मुक्त नहीं अतिगड्ढा युक्त हो गई हैं। बारिश शुरू हो गई है समझ में नहीं आ रहा जिम्मेदार किसका इंतजार कर रहे हैं लगता है जिम्मेदारों को किसी बड़े हादसे का इतंजार है जिसमें गुनेहगार गड्ढे हों और फिर कड़ा एक्शन लेते हुए गडढों का नेस्तानाबूद किया जा सके।
जनाब गड्ढों को हल्के में मत लीजिए, सड़कों के मामूली गड्ढे भी किसी चिराग को तोडने के लिए या बेनूर करने के लिए काफी होते हैं। बात ये समझ में नहीं आई कि जब बरसात से पहले सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का फरमान सुनाया गया था तो सड़के गड्ढों की गिरफ्त में क्यो हैं ? क्या नगर निगम या शहरी विकास मंत्रालय के पास सड़कों की सेहत सुधारने का बजट नहीं है? और अगर बजट नहीं है तो फिर पार्षद 25-30 हजार का भत्ता क्यों मांग रहे थे ? या फिर ये क्यों बताया जा रहा है कि इंफ्रास्ट्रेक्चर डेवलपमेंट में दबा कर खर्च किया जा रहा है !
खर्च हो रहा है तो फिर सड़कों में गड्ढे क्यों है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि मोटी पगार लेने वाले काबिल अधिकारी या मुलाजिम आपके आदेशों को हल्के में ले रहे हों या फिर फाइलें टेबिल टू टेबिल धीमी रफ्तार सरक रही हो मतलब लालफीताशाही का इकबाल खुद को आपसे ज्यादा बुलंद समझ रहा हो..हजूर वजह चाहे जो भी हो नेहरू ग्राम जाने वाली सड़क की दुर्दशा बता रही है कि जनता के साथ कितनी वफ़ा की जा रही है ! याद कीजिए आपने वोट मांगते हुए चकाचक सड़क का वादा भी जनता से किया हो

