भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने बुधवार को जारी अपनी ताजा परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में केंद्र सरकार की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी ‘नमामि गंगे’ योजना को लेकर बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। सीएजी की इस सख्त रिपोर्ट का सीधा असर गंगा सफाई अभियान, उत्तराखंड शासन और संबंधित विभागों की साख पर पड़ा है।
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि पिछले चार दशकों से चल रहे सरकारी दावों और हजारों करोड़ रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का सपना आज भी पूरी तरह अधूरा है। सीएजी की इस रिपोर्ट ने उत्तराखंड के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की पोल खोलकर रख दी है। राज्य के एक-तिहाई से ज्यादा प्लांट गंगा और उसकी सहायक नदियों में बिना साफ किया हुआ जहरीला गंदा पानी गिरने से रोकने में पूरी तरह फेल साबित हुए हैं।
जांच में सामने आया है कि कई संयंत्र अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा बोझ झेल रहे हैं, तो कई प्लांट्स का रख-रखाव भगवान भरोसे है। इस लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि कई इलाकों में फैक्ट्रियों और सीवर का जहरीला कीचड़ सीधे किसानों के खेतों तक पहुंच गया है, जिससे फसलों और जमीनों को भारी नुकसान हो रहा है।
सीएजी ने साल 2018 से 2023 के बीच उत्तराखंड में चली नमामि गंगे की सभी परियोजनाओं का बारीक ऑडिट किया है। रिपोर्ट में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा गया है कि साल 2017-18 में हुई पिछली ऑडिट के बाद भी सरकार ने अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं लिया और योजना के रख-रखाव व क्रियान्वयन में कोई सुधार नहीं हुआ।
ऑडिट रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड के सात मुख्य कस्बों में करोड़ों की लागत से खड़े किए गए 21 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट महज ‘कागजी और सांकेतिक’ बनकर रह गए हैं। सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए फूंक कर बनाए गए ये बड़े-बड़े प्लांट धरातल पर एक भी घर के सीवरेज नेटवर्क से जुड़े ही नहीं हैं।
रिपोर्ट में भूधंसाव से जूझ रहे जोशीमठ का भी हैरान करने वाला उदाहरण दिया गया है। जोशीमठ में करोड़ों रुपए खर्च करके चमचमाती सीवरेज व्यवस्था तो खड़ी कर दी गई, लेकिन अफसरों की लापरवाही के कारण वहां एक भी घर को सीवर कनेक्शन नहीं मिला, जिससे गंदा पानी आज भी खुले नालों से होता हुआ सीधे गंगा में मिल रहा है।
सीएजी ने अपनी जांच में प्लांट्स की क्षमता के भारी असंतुलन को भी बेनकाब किया है। एक तरफ जहां धार्मिक और पर्यटन नगरी हरिद्वार का 68 एमएलडी क्षमता वाला एसटीपी और ऋषिकेश का 5 एमएलडी क्षमता वाला संयंत्र अपनी तय सीमा से कई गुना ज्यादा सीवेज का लोड झेलकर हांफ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देवप्रयाग में बना भव्य एसटीपी अपनी कुल क्षमता के सिर्फ तीन से चार फीसदी हिस्से पर ही चल रहा है।
सीएजी ने इस भारी विफलता के लिए योजना निर्माण में दूरदर्शिता की कमी और स्थानीय जनभागीदारी के पूरी तरह गायब होने को जिम्मेदार ठहराया है। राज्य स्तर पर जो सबसे महत्वपूर्ण ‘नदी बेसिन प्रबंधन योजना’ बननी चाहिए थी, वह सालों बाद भी फाइलों से बाहर नहीं आ सकी है और जिला स्तर पर भी विभागों के पास कोई ठोस रोडमैप नहीं है।
रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में वित्तीय मोर्चे पर राज्य सरकार की उदासीनता पर भी कड़ा प्रहार किया गया है। सीएजी ने साफ शब्दों में कहा है कि उत्तराखंड सरकार ने अपने स्तर पर गंगा तटीय कस्बों में स्वच्छता का ढांचा मजबूत करने के लिए कोई बड़ा या उल्लेखनीय निवेश नहीं किया है, जो इस राष्ट्रीय और पवित्र अभियान के प्रति प्रशासनिक लापरवाही को साफ बयां करता है।

