उत्तराखंड में बिखर रहे संयुक्त परिवार, जानें क्यों एकल परिवारों की तरफ बढ़ रहा लोगों का रुझान

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उत्तराखंड अपनी समृद्ध संस्कृति और पारंपरिक संयुक्त परिवारों के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन अब राज्य में छोटे परिवारों और कम बच्चों का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। जनगणना निदेशालय की ओर से जारी किए गए भवन गणना के प्रारंभिक आंकड़ों से यह नई तस्वीर साफ हुई है।

सामाजिक और जनसांख्यिकीय विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों से लगातार होने वाला पलायन, आधुनिक जीवनशैली में आ रहे बदलाव और दिन-प्रतिदिन बढ़ता महंगा रहन-सहन इसके सबसे बड़े कारण हैं। साल 2011 की जनगणना में जहां प्रदेश की कुल आबादी लगभग 1.01 करोड़ थी और परिवारों की संख्या करीब 20 लाख हुआ करती थी, वहीं अब ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य की जनसंख्या बढ़कर करीब 1.27 करोड़ तक पहुंच चुकी है और परिवारों की कुल संख्या भी 28 लाख के पार जा चुकी है, जो स्पष्ट रूप से एकल परिवारों की बढ़ती संख्या को दर्शाती है।

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संयुक्त परिवारों का सिकुड़ रहा दायरा

आंकड़ों में आए इस बड़े बदलाव के कारण राज्य के भीतर मकानों और परिवारों की संख्या का अनुपात भी काफी बदल गया है। पहले उत्तराखंड में मकानों की संख्या करीब 33 लाख थी जो अब बढ़कर लगभग 45 लाख तक पहुंच गई है, जिसका सीधा मतलब है कि लोग अब अलग घरों में रहना पसंद कर रहे हैं।

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समाजशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार पहले एक ही छत के नीचे परिवार की कई पीढ़ियां एक साथ मिलजुलकर रहती थीं, लेकिन अब लगभग हर नवविवाहित दंपती अपना अलग घर चाहता है जिससे संयुक्त परिवार लगातार बिखर रहे हैं। इसके अलावा पहले एक परिवार में औसतन पांच सदस्य हुआ करते थे, लेकिन अब यह औसत घटकर केवल चार सदस्यों का रह गया है क्योंकि आज की नई पीढ़ी बढ़ते खर्चों के बीच सीमित परिवार को ही सबसे बेहतर और व्यावहारिक मान रही है।

एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्षों और विशेषज्ञों ने इन शुरुआती आंकड़ों के आधार पर एक गंभीर चेतावनी भी दी है। उनका कहना है कि आने वाली अंतिम और विस्तृत रिपोर्ट में उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी इलाकों के बीच सामाजिक और आर्थिक असमानता और ज्यादा साफ होकर सामने आ सकती है।

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इस समय मैदानी इलाकों में रोजगार, शिक्षा और सुविधाओं के चलते आबादी बेहद तेजी से बढ़ रही है, जबकि दूसरी ओर मूलभूत सुविधाओं की कमी और पलायन की दोहरी मार के कारण उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र लगातार खाली होते जा रहे हैं, जो भविष्य के लिए एक बड़ा जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा कर सकता है।