इतिहास के सबसे निचले स्तर पर गिरा भारतीय रुपया, डॉलर के मुकाबले पहली बार पहुंचा 96 के पार

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वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर मची उथल-पुथल के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया शुक्रवार को पहली बार 96 के ऐतिहासिक स्तर से भी नीचे चला गया, हालांकि बाद में इसमें मामूली सुधार देखा गया। कारोबार के उतार-चढ़ाव भरे सत्र के अंत में रुपया 17 पैसे की गिरावट के साथ 95.81 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और लगातार बढ़ती महंगाई की चिंताओं ने रुपये पर चौतरफा दबाव बना दिया है। इसके अलावा, वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू बाजार में अपेक्षाकृत उच्च मूल्यांकन के कारण विदेशी पूंजी के प्रवाह पर भी नकारात्मक असर पड़ा है, जिसने भारतीय मुद्रा की स्थिति को और अधिक कमजोर कर दिया है।

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कच्चे तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव बना मुख्य कारण

रुपये के मूल्य में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे सबसे मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव को माना जा रहा है। विशेष रूप से ईरान युद्ध के भड़कने के बाद से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में भारी तेजी आई है, जिसने भारत के आयात बिल को बढ़ा दिया है। इस स्थिति के चलते चालू वित्त वर्ष में रुपया अब तक छह प्रतिशत से भी अधिक टूट चुका है, जबकि केवल पिछले छह कारोबारी सत्रों की बात की जाए तो इसमें लगभग दो प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की जा चुकी है। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण डॉलर की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे रुपया लगातार बैकफुट पर जाने को मजबूर हुआ है।

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विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी और आरबीआई का हस्तक्षेप

मुद्रा बाजार के जानकारों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर मंदी की आशंकाओं और एआई-आधारित निवेश अवसरों की कमी के चलते विदेशी निवेशकों ने पूंजी प्रवाह को धीमा कर दिया है, जिससे भारतीय परिसंपत्तियों पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, शुक्रवार को बाजार में आई इस भारी गिरावट के बीच भारतीय रिजर्व बैंक के संभावित हस्तक्षेप और डॉलर की बिकवाली से रुपये को थोड़ा सहारा मिला, जिसके कारण यह 96 के स्तर से नीचे जाने के बाद वापस 95.81 पर संभलने में कामयाब रहा। आगामी दिनों में बाजार की नजरें रिजर्व बैंक के अगले कदमों पर टिकी हैं, जो मुद्रा के इस अवमूल्यन को रोकने के लिए जरूरी उपाय कर सकता है।

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