कर्णप्रयाग-नगरासू मामले में सोशल मीडिया बना ‘अराजकता का हथियार’,देवभूमि की मेहमाननवाज़ी की साख पर लगी चोट

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उत्तराखंड के कर्णप्रयाग से लेकर नगरासू तक हुए हालिया निहंग प्रकरण ने सोशल मीडिया के गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। इस पूरे संवेदनशील मामले में जहां एक तरफ सरकार, जिला प्रशासन और पुलिस कानून सम्मत तरीके से अपना काम कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया कुछ नासमझ यूजर्स के हाथों में ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’ साबित हुआ।

मामला ऐसा भी नहीं था कि तूल-तमाशे तक पहुंचता या मौके पर सुलझ नहीं सकता लेकिन सोशल मीडिया के कुछ नासमझ यूजर्स ने मामले को अराजक प्लेटफार्म में पहुंचा दिया जहां दिल मिलने की तो छोड़िये हाथ मिलाने की गुंजाइश तक खत्म हो गई।

देखा जाए तो न तो उत्तराखंडी समाज ऐसा है और न सिक्ख समुदाय वैसा है लेकिन सोशल मीडिया ने मामूली घटना को संजीदा ही नहीं पेंचीदा मसला बना दिया। जब तक निहंग नगरासू ने वापस नहीं लौट गए तब तक प्रशासन के हाथ पांव फूले रहे। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में लाइक कमेंट्स की हसरत पूरी करने के लिए कुछ उस हद तक गिर गए जहां हमारी देवभूमि का अतिथि देवो भवः का भाव सिर्फ जख्मी ही नहीं हुआ बल्कि लहू लुहान हो गया है।

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इस घटना को अगर हम अपने आतिथ्य सत्कार और देवभूमि के मिज़ाज के तराजू पर तौलेंगे तो निश्चत तौर पर हम मेजबान अपनी शक्ल को आईने में नहीं देख सकते। क्योंकि हमारा अक्श हमसे पूछेगा तुम तो ऐसे नहीं थे तुम तो मेहमान के लिए पलक पावंडे बिछाकर रखते थे..आने वाले का आरती उतारकर तिलक लगा कर स्वागत सत्कार करते थे फिर ये बदमिजाजी क्यों ?

जांच चल रही है दूध का दूध और पानी का पानी भी हो जाएगा लेकिन बेझिझक कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया ने अपनी हरकत से अविश्वास का पेस्टीसाइड छिड़का है जिसकी भरपाई करने के लिए दिल बड़े करने होंगे. सदभावना की लकीरें लंबी-लंबी करनी होंगी ताकि सोशल मीडिया के जरिए दोनो समुदायों के बीच फैला ये मैल साफ हो सके।

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देखा जाए तो ये महज तस्वीरों का खेल नही था। दानिशमंद इंन्फ्लूयंसर होते तो बात इतनी बढ़ती ही नहीं। आग सुलगने से पहले चिंगारी बुझा दी गई होती। लेकिन लाईक वालों के चलते चिंगारी ऐसी आग बनी कि उत्तराखंड से लेकर पंजाब तक को झुलसाने लगी। इस मामले में सोशल मीडिया ने जो उछल कूद की है उस पर बशीर साहब का एक शेर याद आता है, “उम्र बीत जाती है एक घर बनाने में. तुम्हें शर्म नहीं आती बस्तियां जलाने में।”

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हमारे पुरखों ने जो उत्तराखंड की मेहमाननवाजी की परंपरा को बनाने में सदियो लगाए और चंद लाइक कंमेंट की भूख ने सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर सेकेंडों में उस पारंपरिक इमारत को ध्वस्त कर दिया। माना कि सोशल मीडिया का प्लेटफार्म अभिव्यक्ति की आजादी का मंच है, लेकिन उन मोबाइल वालों को इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि आजादी और अराजकता में बड़ा फर्क है।

उनकी हरकत ने सिर्फ विश्वास को लहूलुहान नहीं किया बल्कि उत्तराखंडियत को भी घायल किया है,राज्य के पर्यटन,तीर्थाटन और कारोबार की रीढ़ पर भी चोट की है। सोशल मीडिया का इस्तमाल कीजिए लेकिन संभल कर सोच विचार कर वरना ये प्लेटफार्म ऐसा है जहां बात निकलती है तो दूर तलक जाती है।

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