सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मातृभाषा में शिक्षा पाना बच्चों का संवैधानिक अधिकार

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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देना उनके अधिकारों से जुड़ा एक मौलिक मुद्दा है, जिसे किसी भी स्थिति में अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने राजस्थान सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं कि वह राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में ‘राजस्थानी’ भाषा को एक विषय के रूप में शामिल करने के लिए आवश्यक नीतिगत ढांचा तैयार करे। कोर्ट का मानना है कि जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा दे रही है, तो यह राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि वे इसे अपने शैक्षणिक ढांचे में लागू करें।

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राजस्थानी भाषा का कार्यान्वयन

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप एक व्यापक रणनीति तैयार करें। इस योजना के तहत राजस्थानी भाषा को स्थानीय और क्षेत्रीय भाषा का दर्जा देते हुए स्कूलों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए, जिसकी शुरुआत प्राथमिक और प्रारंभिक स्तर से हो और धीरे-धीरे इसे उच्च कक्षाओं तक बढ़ाया जाए। अदालत ने यह भी तर्क दिया कि राजस्थानी पहले से ही कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है, इसलिए इसे स्कूली स्तर पर मान्यता न देना तर्कसंगत नहीं है

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राज्य सरकार के तर्कों पर टिप्पणी

अदालत ने राजस्थान सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि केवल संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को ही अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस रवैये को संकीर्ण सोच का परिचायक बताते हुए कहा कि संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी पर न्यायपालिका चुप नहीं रह सकती। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 4.36 करोड़ लोग राजस्थानी भाषा बोलते हैं, जो इसे शिक्षा के माध्यम के रूप में शामिल करने की मांग को और अधिक मजबूती प्रदान करता है

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