देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट भले अभी बाकी हो, लेकिन नेताओं के बयान देखकर लगता है कि चुनावी सरगर्मी ने समय से पहले दस्तक दे दी है। पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत इन दिनों अपने बयानों को लेकर खासे चर्चाओं में हैं।
ताजा बयान स्मार्ट सिटी को लेकर है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि स्मार्ट सिटी के 900 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जेब में चले गए। बयान ने सियासी तापमान जरूर बढ़ा दिया, लेकिन स्मार्ट सिटी की टाइमलाइन सामने आते ही सवाल भी खड़े होने लगे हैं।
सवाल सीधा है जिस समय स्मार्ट सिटी योजना के बड़े कामों का शिलान्यास हुआ, उस समय पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे ही नहीं। ऐसे में 2019 से शुरू हुई योजना को सीधे वर्तमान मुख्यमंत्री से जोड़ने वाले बयान के राजनीतिक मायने तलाशे जाने लगे हैं। स्मार्ट सिटी के तहत नवंबर 2019 में करीब 575 करोड़ रुपये के कार्यों का शिलान्यास हुआ था। उस वक्त प्रदेश में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थे और पुष्कर सिंह धामी विधायक थे।
इन कार्यों में 204.46 करोड़ रुपये का इंटीग्रेटेड ऑफिस कॉम्प्लेक्स/ग्रीन बिल्डिंग, 190.54 करोड़ की स्मार्ट रोड, 56.63 करोड़ का स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट, 32.59 करोड़ की पेयजल संवर्धन योजना, 28.41 करोड़ की सीवरेज योजना, 20.85 करोड़ का परेड ग्राउंड रेनोवेशन, 16.27 करोड़ की स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज, 13.10 करोड़ का पलटन बाजार विकास और 12.33 करोड़ की दून लाइब्रेरी जैसे काम शामिल थे।
यानी स्मार्ट सिटी की नींव धामी के मुख्यमंत्री बनने से काफी पहले पड़ चुकी थी। इसके बाद दिसंबर 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने आईटी पार्क में इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का उद्घाटन किया। फिर कोरोना काल आया। अप्रैल 2020 में लॉकडाउन के कारण रुके स्मार्ट सिटी के काम दोबारा शुरू कराने के निर्देश दिए गए।
अक्टूबर 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने मौके पर जाकर निर्माण कार्यों का निरीक्षण भी किया। जनवरी 2021 में ‘सदैव दून’ इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर का फाइनल गो-लाइव हुआ। इसके कुछ महीने बाद जुलाई 2021 में पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बने।
अब यही पूरी टाइमलाइन हरक सिंह रावत के बयान पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर स्मार्ट सिटी के बड़े काम 2019 से ही शुरू हो चुके थे और उस समय धामी मुख्यमंत्री नहीं थे, तो फिर 900 करोड़ रुपये सीधे उनकी जेब में जाने का आरोप किस आधार पर लगाया गया?
जाहिर है, यदि कोई वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार का आरोप है तो उसके समर्थन में दस्तावेज, जांच या ठोस वित्तीय प्रमाण भी सामने आने चाहिए। राजनीति में बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। खासकर जब 2027 का चुनाव सामने हो तो विपक्षी नेता सरकार की योजनाओं और फैसलों को निशाने पर लेते हैं। लेकिन इस बयान को लेकर सियासी गलियारों में एक और चर्चा है हरक जितना सक्रिय दिखेंगे, उतना ही कांग्रेस की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे।
अब विपक्ष में हैं तो सरकार पर हमला करना राजनीतिक धर्म भी माना जा सकता है। मगर स्मार्ट सिटी की फाइलें तारीखों के साथ मौजूद हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं कि बयान कितना चटपटा है, सवाल यह है कि 900 करोड़ की ‘जेब’ का हिसाब आखिर किस दस्तावेज में है? सियासत में चर्चा बटोरना आसान है, लेकिन आरोप को साबित करना उतना ही मुश्किल। फिलहाल हरक के बयान ने स्मार्ट सिटी से ज्यादा ‘सियासी स्मार्टनेस’ पर बहस जरूर छेड़ दी है।

