खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव और खेती की बढ़ती लागत के बीच केंद्र सरकार ने उर्वरकों के बेतहाशा इस्तेमाल और उनकी अनियंत्रित बिक्री पर नकेल कसने का फैसला किया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य उर्वरकों की खपत में 5 से 10 प्रतिशत तक की कमी लाना है, जिससे सरकार पर सालाना पड़ने वाले करीब 2 लाख करोड़ रुपये के सब्सिडी बोझ को कम किया जा सके। सरकार का लक्ष्य खेती को अधिक टिकाऊ बनाना और यह सुनिश्चित करना है कि उर्वरक केवल जरूरतमंद किसानों तक ही पहुंचे।
सब्सिडी का भारी बोझ और यूरिया की असली कीमत
वर्तमान में सरकार उर्वरकों पर भारी सब्सिडी दे रही है। आंकड़ों के अनुसार, किसानों को 45 किलोग्राम यूरिया की जो बोरी मात्र 266 रुपये में मिलती है, उसकी वास्तविक कीमत करीब 4500 रुपये तक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित होने के कारण यूरिया का उत्पादन महंगा हो गया है, जिससे भविष्य में सब्सिडी का बोझ और बढ़ने की आशंका है। इसी को देखते हुए सरकार अब खपत घटाने पर जोर दे रही है।
ICAR तैयार करेगा जिलावार खपत का विवरण
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। परिषद अब जिलावार वैज्ञानिक मैपिंग के आधार पर यह निर्धारित करेगी कि किस जिले में किस प्रकार के और कितनी मात्रा में उर्वरक की आवश्यकता है। इससे न केवल उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को रोकने में मदद मिलेगी, बल्कि मिट्टी की सेहत भी बेहतर होगी। यह योजना आगामी खरीफ सीजन से अधिक प्रभावी ढंग से लागू की जा सकती है।
पारदर्शी वितरण प्रणाली और निगरानी
उर्वरकों के दुरुपयोग और औद्योगिक क्षेत्रों में इसके डायवर्जन को रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को सख्त बनाया जा रहा है। अब ‘किसान आईडी’ के माध्यम से उर्वरकों की बिक्री को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सब्सिडी वाला यूरिया केवल कृषि कार्यों के लिए इस्तेमाल हो और इसकी कालाबाजारी या गैर-कृषि उपयोग पर पूरी तरह रोक लग सके।
खेती के लिए भविष्य की चुनौतियां
हालांकि वर्तमान में देश में उर्वरकों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए खपत में कमी लाना अनिवार्य माना जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से अब एक ऐसी नियंत्रित प्रणाली विकसित की जा रही है, जो आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों मोर्चों पर फायदेमंद साबित होगी।

