“सरकारी तनख्वाह, निजी काम—साहब का अनोखा सिस्टम!” निगम अधिकारी के लिए भूमि खोजने के लिए लगे मुलाजिम बने चर्चाओं का केंद्र…

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सरकारी दफ्तरों में फाइलें चलती हैं, लेकिन यहां तो “प्लॉट की तलाश” चल रही थी—वो भी पूरे सरकारी अमले के साथ! राज्य के एक निगम में तैनात एक अधिकारी इन दिनों अपनी कार्यशैली को लेकर जबरदस्त चर्चाओं में हैं। आरोप है कि साहब ने अपने लिए रिहायशी जमीन तलाशने का ऐसा “ऑपरेशन” चलाया कि दफ्तर के मुलाजिमों को ही मैदान में उतार दिया गया।
कहानी कुछ यूं है कि अधिकारी को रोज अपने गृह क्षेत्र से कार्यस्थल तक लंबा सफर तय करना पड़ता था। इस रोजाना की भागदौड़ से राहत पाने के लिए उन्होंने बीच रास्ते में ही एक बढ़िया प्लॉट खरीदने का मन बना लिया। अब प्लॉट लेना था, तो मेहनत भी चाहिए थी—लेकिन अपनी नहीं, कर्मचारियों की!
सूत्र बताते हैं कि अधिकारी के “मौखिक आदेश” के बाद कर्मचारी पहले ऑफिस पहुंचकर हाजिरी लगाते और फिर निकल पड़ते “प्लॉट मिशन” पर। कोई इलाके की टोह ले रहा था, कोई जमीन के कागज खंगाल रहा था, तो कोई स्थानीय ब्रोकरों से संपर्क साध रहा था। यानी सरकारी काम छोड़, पूरा स्टाफ साहब के सपनों का आशियाना ढूंढने में जुट गया।
दिलचस्प बात यह है कि यह सब कुछ इतने “सिस्टमेटिक” तरीके से हो रहा था कि देखने वाले भी दंग रह जाएं। कर्मचारियों के बीच चर्चा थी कि साहब को जल्द से जल्द “परफेक्ट लोकेशन” चाहिए—ऐसी जगह जो ऑफिस के रास्ते में हो, कनेक्टिविटी बढ़िया हो और कीमत भी “मैनेजेबल” हो। और इसके लिए दफ्तर मानो रियल एस्टेट एजेंसी में तब्दील हो गया।
हालांकि इस पूरे मामले ने अब तूल पकड़ना शुरू कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकारी कर्मचारियों का काम किसी अधिकारी के निजी कामों में लगना है? क्या ऑफिस की जिम्मेदारियों को छोड़कर निजी फायदे के लिए फील्ड में घूमना सेवा नियमों का हिस्सा है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह सब बिना किसी दबाव के हो रहा था, या फिर “आदेश” का असर था?
कर्मचारियों के बीच भी इसको लेकर दबी जुबान में नाराजगी सामने आ रही है। कुछ का कहना है कि मजबूरी में उन्हें यह सब करना पड़ा, क्योंकि “ना” कहने का मतलब खुद के लिए परेशानी मोल लेना हो सकता था। वहीं कुछ लोग इसे सिस्टम की कमजोरियों का उदाहरण बता रहे हैं, जहां अधिकार का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए किया जाता है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह मामला यहीं दबकर रह जाता है या फिर उच्च स्तर तक पहुंचकर किसी जांच का रूप लेता है। क्योंकि अगर चर्चाओं में सच्चाई है, तो यह सिर्फ एक प्लॉट की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम के दुरुपयोग की एक बड़ी तस्वीर भी पेश करता है।
फिलहाल, शहर के गलियारों में एक ही चर्चा है—“साहब को प्लॉट मिला या नहीं, ये तो पता नहीं… लेकिन सिस्टम जरूर कटघरे में खड़ा हो गया है!”

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