हरिद्वार में आयोजित होने वाले आगामी कुंभ मेले की तैयारियों के बीच उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की एक चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है, जो गंगनहर में बढ़ते प्रदूषण की भयावह तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, बहादराबाद से लेकर रुड़की तक लगभग 10 से अधिक बड़े गंदे नाले सीधे तौर पर गंगनहर में गिर रहे हैं, जिसकी वजह से पानी में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
जलीय जीवों के सुरक्षित अस्तित्व के लिए जहां पानी में कम से कम 5 मिलीग्राम प्रति लीटर ऑक्सीजन होनी चाहिए, वहीं अब यह स्तर घटकर महज 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी कम रह गया है। यह स्थिति न केवल गंगा की निर्मलता को प्रभावित कर रही है, बल्कि मछली और मेंढक जैसे जलीय जीवों के जीवन के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है।
सिडकुल की स्थापना और गिरती जल गुणवत्ता
सिंचाई विशेषज्ञों और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, हरिद्वार में सिडकुल की स्थापना के बाद से गंगनहर के प्रदूषण स्तर में अत्यधिक वृद्धि देखी गई है। बहादराबाद क्षेत्र के आसपास स्थित कई फैक्ट्रियों का जहरीला और दूषित पानी बिना किसी उचित ट्रीटमेंट के सीधे नहर के कच्चे किनारों और पाइपों के माध्यम से बहाया जा रहा है।
नए घाटों के निर्माण के दौरान भी किनारा काटकर फाउंडेशन बनाने और मलबे के सही निस्तारण न होने के कारण स्थिति और भी बिगड़ गई है, जिससे नहर का पानी लगातार जहरीला होता जा रहा है और जलीय पर्यावरण गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की बढ़ती लापरवाही
गंगनहर को प्रदूषित करने में औद्योगिक इकाइयों के साथ-साथ शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की गंदगी भी समान रूप से जिम्मेदार है। ज्वालापुर के कसाबान जैसे इलाकों और अन्य शहरी क्षेत्रों से निकलने वाले गंदे नाले सीधे गंगा की धारा में मिल रहे हैं।
हालांकि विभागीय स्तर पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से पानी साफ करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर इनका प्रभाव शून्य नजर आता है। जब नहर की वार्षिक बंदी होती है, तब भी गंदगी का बहाव कम नहीं होता, जो प्रशासन और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक उदासीनता और कार्रवाई का अभाव
इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए सिंचाई विभाग ने पूर्व में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य संबंधित निकायों को पत्र लिखकर अवगत कराया था, परंतु अब तक कोई ठोस कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। अधिकारियों और स्थानीय निकायों की इस उदासीनता के कारण समस्या विकराल रूप लेती जा रही है।
सिंचाई विभाग के एसडीओ अनुज बंसल के अनुसार, यदि समय रहते कोई प्रभावी योजना नहीं बनी तो गंगनहर से जलीय जीवों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है। वर्तमान में उच्च अधिकारियों ने नालों की रिपोर्ट तलब की है, जिसके बाद ही आगे की कार्रवाई की उम्मीद जताई जा रही है।

