स्वास्थ्य विभाग में नया फॉर्मूला — योग्यता छोड़ो, संपर्क जोड़ो! स्वास्थ्य विभाग से चिकित्सा शिक्षा में डॉक्टर की तैनाती बनी चर्चाओं का विषय…!

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देहरादून: “सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का”… स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों यह कहावत कुछ डॉक्टरों की कार्यशैली पर बिल्कुल सटीक बैठती नजर आ रही है। मलाईदार पोस्टिंग और मेडिकल कॉलेजों में तैनाती पाने की होड़ इस कदर हावी है कि नियम-कायदों को ताक पर रखकर सिस्टम को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिशें लगातार चर्चा में हैं। मामला दून मेडिकल कॉलेज से जुड़ा है, जहां स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में तैनात एक डॉक्टर की चिकित्सा शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर तैनाती ने विभागीय गलियारों में नया बवाल खड़ा कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक संबंधित चिकित्सक की तैनाती इस शर्त पर की गई थी, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना सभी मानकों को पूरा किए इतनी अहम पोस्टिंग कैसे दे दी गई। मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि मेडिकल एजुकेशन में टीचिंग पोस्ट पर नियुक्ति के लिए शोध पत्रों और अकादमिक योग्यता से जुड़े स्पष्ट नियम निर्धारित हैं। जानकार बताते हैं कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से सीधे मेडिकल कॉलेज में टीचिंग फैकल्टी के तौर पर आने के लिए डॉक्टर के पास निर्धारित रिसर्च पब्लिकेशन और शिक्षण अनुभव होना अनिवार्य माना जाता है।
यही वजह है कि इस नियुक्ति को लेकर अब स्वास्थ्य विभाग से लेकर शासन तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। सूत्रों का दावा है कि फाइल कई स्तरों पर अटकती रही। कुछ अधिकारियों ने नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल भी उठाए और नियमों का हवाला देते हुए आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन अंततः ऊंची पहुंच और दबाव की राजनीति के आगे सारी आपत्तियां धरी की धरी रह गईं।
दून मेडिकल कॉलेज पहले भी आंतरिक राजनीति और खेमेबाजी को लेकर सुर्खियों में रहा है। यहां डॉक्टरों के बीच पेशेवर सहयोग से ज्यादा वर्चस्व की लड़ाई चर्चा का विषय बनती रही है। आए दिन पोस्टिंग और प्रमोशन को लेकर रस्साकशी सामने आती रही है। संबंधित डॉक्टर का नाम भी पहले कई विवादों से जुड़ चुका है। कभी सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोलना, तो कभी मनपसंद तैनाती के लिए दबाव की राजनीति करना… ऐसे आरोप पहले भी लगते रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अंदरखाने में चर्चा यह भी है कि मेडिकल कॉलेज में तैनाती के बाद अब दूसरे डॉक्टरों में भी नाराजगी बढ़ रही है। कई चिकित्सकों का मानना है कि यदि नियमों को दरकिनार कर कुछ लोगों को विशेष लाभ दिया जाएगा तो वर्षों से निर्धारित प्रक्रिया का पालन कर रहे डॉक्टरों का मनोबल टूटेगा। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब एक डॉक्टर को बिना पूरी प्रक्रिया के एडजस्ट किया जा सकता है तो फिर बाकी लोगों के लिए नियमों की दीवार क्यों खड़ी की जाती है।
दरअसल, दून मेडिकल कॉलेज प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी मेडिकल संस्थान है और यहां पोस्टिंग को बेहद प्रभावशाली माना जाता है। बेहतर सुविधाएं, राजनीतिक और प्रशासनिक पहुंच तथा अकादमिक प्रतिष्ठा के कारण यहां तैनाती पाने के लिए जबरदस्त लॉबिंग होने की चर्चाएं अक्सर सामने आती रही हैं। यही कारण है कि कॉलेज के भीतर गुटबाजी भी किसी से छिपी नहीं है।
पूर्व में भी मेडिकल कॉलेज में आपसी खींचतान और आरोप-प्रत्यारोप के मामले सामने आने पर सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा था। स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने खुद बैठक लेकर डॉक्टरों को चेतावनी दी थी कि व्यक्तिगत लड़ाइयों और खेमेबाजी से संस्थान की छवि खराब हो रही है। उन्होंने साफ कहा था कि मरीजों की सेवा और मेडिकल शिक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, ना कि व्यक्तिगत वर्चस्व की राजनीति।
लेकिन मौजूदा प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग में नियम बड़े हैं या पहुंच? क्या मेडिकल शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी नियुक्तियों का आधार योग्यता से ज्यादा प्रभाव बनता जा रहा है? यदि ऐसा है तो इसका सीधा असर चिकित्सा व्यवस्था और छात्रों की पढ़ाई पर पड़ना तय माना जा रहा है।
अब निगाहें शासन पर टिकी हैं। देखना दिलचस्प होगा कि विवादित नियुक्ति की फाइलों की दोबारा समीक्षा होती है या फिर मामला हमेशा की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। फिलहाल दून मेडिकल कॉलेज के गलियारों में यही चर्चा है कि “जिसकी पहुंच मजबूत, उसी की पोस्टिंग पक्की।”

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