हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण इन दिनों विकास से ज्यादा “विभीषण राजनीति” को लेकर चर्चाओं में है। सरकारी सिस्टम के भीतर बैठा एक ऐसा मुलाजिम पूरे महकमे की कलई खोलने में जुटा हुआ है, जिसने अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक की नींद उड़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि विभाग की अंदरूनी खींचतान अब शासन तक सवाल खड़े कराने लगी है और सरकार की कार्यप्रणाली भी कटघरे में दिखाई देने लगी है।
सूत्रों की मानें तो यह चर्चित कर्मचारी खुद को “सिस्टम सुधारक” साबित करने में लगा रहता है, लेकिन विभागीय गलियारों में चर्चा कुछ और ही है। कहा जा रहा है कि जब भी उसके ऊपर कार्रवाई की तलवार लटकती है, तभी अचानक कोई नया विवाद जन्म ले लेता है। कभी किसी इंजीनियर की कार्यशैली पर सवाल उठाए जाते हैं, तो कभी विभागीय बैठकों और चर्चाओं को ही ऐसा मोड़ दे दिया जाता है कि पूरा सिस्टम उलझकर रह जाए। नतीजा यह होता है कि असली मुद्दा पीछे छूट जाता है और नया बखेड़ा सुर्खियों में आ जाता है।
विभाग के कई अधिकारी दबे स्वर में मानते हैं कि यह मुलाजिम “सूचना और सनसनी” की राजनीति में माहिर है। जैसे ही कुर्सी पर खतरा मंडराता है, वैसे ही फाइलों के पन्ने खुलने लगते हैं, आरोपों की फेहरिस्त तैयार हो जाती है और माहौल ऐसा बना दिया जाता है मानो पूरा विभाग भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की जड़ हो। इससे न केवल विभागीय कामकाज प्रभावित होता है बल्कि सरकार की छवि पर भी सीधा असर पड़ता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई बार इस कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की पूरी पटकथा तैयार हुई। अफसरों ने सख्त कदम उठाने का मन बनाया, लेकिन हर बार ऐन मौके पर कोई ऐसा दांव खेल दिया गया कि कार्रवाई की फाइल ठंडी पड़ गई। विभागीय गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि यह “प्रपंच रचने” की कला में इतना माहिर है कि खुद पर आई मुसीबत को दूसरों के सिर पर डाल देता है और खुद साफ बच निकलता है।
हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण में अब यह चर्चा आम हो चली है कि आखिर कब तक एक कर्मचारी पूरे सिस्टम को अपने इशारों पर नचाता रहेगा। अधिकारी भी समझ चुके हैं कि विभाग की साख बचानी है तो अब केवल चेतावनी से काम नहीं चलेगा। अंदरखाने यह भी कहा जा रहा है कि इस बार विभाग ने पूरी तैयारी कर ली है और “विभीषण” की असली पहचान भी खुल चुकी है।
सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में बड़ी कार्रवाई से इनकार नहीं किया जा सकता। वजह साफ है—अब मामला केवल एक कर्मचारी की हरकतों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि विभाग की विश्वसनीयता और सरकार की छवि का प्रश्न बन चुका है। ऐसे में यदि जल्द सख्त कदम नहीं उठाए गए तो विकास प्राधिकरण की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल और गहरे हो सकते हैं।
फिलहाल हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण में एक ही चर्चा है—“सिस्टम का विभीषण” आखिर कब तक बच पाएगा?

