कहने को मेडिकल कॉलेज और इंतजामात डिसपेंसरी वाले भी नहीं..जी हां आप यकीन करेंगे कि दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दर्जन भर से ज्यादा और डेढ दर्जन से कम व्हीलचेयर से काम चलाया जा रहा है। खबर है कि इनमे से भी चार व्हीलचेयर को भी इलाज की दरकार है। जबकि अस्पताल मे ओपीडी के लिए हर रोज दो से ढाई हजार मरीज आते हैं।
आलम ये रहता है कि तिमारदारों को असहाय मरीजों को डॉक्टर की केबिन तक पहुंचाने के लिए लिफ्ट तक ढोना पड़ता है या फिर दीवार के सहारे हौले-हौले सरकाना पड़ता है। जरा सोचिए अस्थि रोग विभाग में उन मरीजो का क्या हाल होता होगा जिनको पलास्टर चढ़ाना होता है या जिनका पलास्टर चढा रहता है।
खबर है कि अस्पताल प्रशासन ने दो महीने पहले दस नई व्हीलचेयर की डिमांड की थी जो अब तक मुहैय्या नहीं हुई। वहीं अस्पातल प्रशासन की छीछालेदर करवा रही खराब पड़ी व्हीलचेयर्स को ठीक करने के लिए भी निर्देश दिये गए है।
व्हीलचेयर ठीक होकर आएँगी या नहीं कहना मुश्किल है और नई व्हीलचेयर की डिमांड कब तक पूरी होगी इस बारे में कोई कुछ कहता नहीं। हालांकि कहा जा रहा है कि तीमारदार व्हीलचेयर का इस्तमाल न तो सलीके से करते हैं और न उन्हें तय जगह वर वापस रखते हैं इसकी वजह से भी अव्यवस्था बनती है।
बहरहाल वजह चाहे जो भी हो असल सवाल ये है कि दून मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में व्यवस्थाएं कब दुरुस्थ होंगी जो लगे कि हां वाकई मे ये दून मेडिकल कॉलेज का अस्पताल है।

