167 कैदियों की लटकी रिहाई पर HC का सरकार को रिहाई नीति बताओ का ऑर्डर

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्रदेश की जेलों में आजीवन कारावास की सजा पूरी कर चुके कैदियों को रिहा न किए जाने पर गहरी नाराजगी जताई है। न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह एक सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करे कि इन कैदियों की रिहाई के लिए क्या नीति बनाई गई है।

कैदियों का तर्क है कि वे अपनी सजा की अवधि पूरी कर चुके हैं, इसके बावजूद उन्हें जेल में रखना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन और अदालत के पुराने आदेशों की अवहेलना है। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने पहले खुद जेलों का दौरा किया था, जहाँ 167 ऐसे कैदी मिले थे जिनकी सजा पूरी हो चुकी थी, लेकिन कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझने के कारण वे अब भी सलाखों के पीछे हैं।

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राज्य सरकार का स्पष्टीकरण

हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि पूर्व के आदेशों का पालन करते हुए कई कैदियों को पहले ही रिहा किया जा चुका है। हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि संगीन अपराधों में शामिल कैदियों को रिहा नहीं किया गया है और कुछ मामलों में रिहाई के लिए राज्य सरकार की विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है।

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इस बीच, सर्वोच्च न्यायालय ने भी सभी उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि जिन कैदियों की सजा पूरी हो चुकी है, उनकी रिहाई की प्रक्रिया में कोई देरी न हो। अब न्यायालय यह देखना चाहता है कि सरकार संदिग्ध प्रकृति के कैदियों और सजा पूरी कर चुके सामान्य कैदियों के बीच भेदभाव करने और पारदर्शी रिहाई सुनिश्चित करने के लिए कौन सी ठोस नीति अपनाती है।