धामों में आस्था का सैलाब, स्वास्थ्य विभाग की तैयारी बेहाल,65 दिन में हुई 200 मौतों ने खोली सिस्टम की पोल….

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देहरादून। उत्तराखंड की चारधाम यात्रा इस समय अपने पूरे शबाब पर है। लाखों श्रद्धालु बाबा केदार, बदरीविशाल, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। सरकार यात्रा को ऐतिहासिक और सफल बताने में जुटी है, लेकिन यात्रा मार्ग से सामने आ रहे मौतों के आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। यह कहानी उस स्वास्थ्य व्यवस्था की है, जिसके दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है।

19 अप्रैल 2026 से शुरू हुई चारधाम यात्रा में अब तक करीब 200 श्रद्धालुओं की मौत हो चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बद्रीनाथ में 62, केदारनाथ में 94, गंगोत्री में 18 और यमुनोत्री में 26 यात्रियों की मौत हुई है। अधिकांश मौतों को स्वास्थ्य संबंधी कारणों से हुई सामान्य मृत्यु बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि यदि सब कुछ सामान्य है तो मौतों का यह आंकड़ा हर दिन क्यों बढ़ रहा है?

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दरअसल, चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है बल्कि यह एक कठिन भौगोलिक और शारीरिक चुनौती भी है। मैदानी क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु कुछ ही घंटों में हजारों फीट की ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं। तापमान में भारी बदलाव, ऑक्सीजन की कमी, थकान और पहले से मौजूद बीमारियां कई बार जानलेवा साबित हो जाती हैं। यही वजह थी कि पूर्व वर्षों में स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन यात्रियों को लगातार जागरूक करता था।

यात्रा शुरू करने से पहले स्वास्थ्य परीक्षण, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जाने से पूर्व विश्राम, हृदय और श्वास रोगियों के लिए विशेष सावधानी, विभिन्न भाषाओं में जारी एसओपी और जगह-जगह जागरूकता अभियान चलाए जाते थे। लेकिन इस बार सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये सारी व्यवस्थाएं सिर्फ कागजों तक सीमित होकर रह गई हैं?

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यदि स्वास्थ्य विभाग अपनी तैयारियों और व्यवस्थाओं को लेकर इतना ही आश्वस्त है तो फिर 200 मौतों का आंकड़ा आखिर क्या संकेत दे रहा है? क्या यात्रा मार्गों पर स्वास्थ्य जांच पर्याप्त नहीं है? क्या जोखिम वाले यात्रियों की सही पहचान नहीं हो पा रही? क्या एसओपी का पालन कराने के लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है? या फिर सिस्टम केवल पंजीकरण के आंकड़े गिनने में व्यस्त है और यात्रियों की सुरक्षा पीछे छूट गई है?

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि केदारनाथ धाम में अकेले 94 मौतें दर्ज हुई हैं। यह आंकड़ा बताता है कि सबसे कठिन यात्रा मार्ग पर स्वास्थ्य निगरानी और सतर्कता को लेकर गंभीर समीक्षा की जरूरत है। यदि श्रद्धालु लगातार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का शिकार हो रहे हैं तो केवल मौतों को “सामान्य” बताकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।सिस्टम हर साल चारधाम यात्रा को विश्वस्तरीय बनाने के दावे करती है। हेलीकॉप्टर सेवाओं से लेकर डिजिटल पंजीकरण तक की चर्चा होती है, लेकिन यदि यात्रियों का जीवन सुरक्षित नहीं है तो फिर इन व्यवस्थाओं की सफलता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

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चारधाम यात्रा आस्था का पर्व है, लेकिन आस्था के साथ सुरक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकारी सिस्टम और स्वास्थ्य विभाग की ही है। 200 मौतों का आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि सिस्टम के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है। सवाल यह कि क्या स्वास्थ्य विभाग केवल मौतों का रिकॉर्ड तैयार कर रहा है या उन्हें रोकने के लिए भी गंभीरता से काम कर रहा है?

जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक चारधाम यात्रा की सफलता के दावों पर मौतों का यह आंकड़ा भारी पड़ता रहेगा।

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