देश में थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई ने पिछले 42 महीनों के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जिससे आम जनता की आर्थिक परेशानियां बढ़ गई हैं। अप्रैल माह में थोक महंगाई दर बढ़कर 8.30 प्रतिशत पर पहुँच गई है, जो मार्च के 3.88 प्रतिशत के मुकाबले लगभग दोगुनी है। इस अचानक आए उछाल का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी को माना जा रहा है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2022 के बाद यह पहली बार है जब थोक महंगाई ने 8 प्रतिशत का स्तर पार किया है। इस महंगाई की सबसे अधिक मार ईंधन और बिजली की कीमतों पर पड़ी है, जहाँ अप्रैल में ईंधन श्रेणी की महंगाई दर 24.71 प्रतिशत तक दर्ज की गई, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था और विनिर्माण क्षेत्र प्रभावित हो रहा है।
रसोई के बजट पर वैश्विक संकट का असर
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने से न केवल ईंधन, बल्कि दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दाम भी आसमान छूने लगे हैं। खाद्य तेल, मसाले, चायपत्ती और सूखे मेवों जैसी अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों में कंपनियों ने 10 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी है। इसके अतिरिक्त, प्लास्टिक दाने और टिन जैसे कच्चे माल के दाम बढ़ने से पैकेजिंग सामग्री भी 15 से 70 प्रतिशत तक महंगी हो गई है, जिसका सीधा असर एफएमसीजी कंपनियों के उत्पादन खर्च पर पड़ा है। कई कंपनियों ने कीमतों में सीधी बढ़ोतरी करने के बजाय उत्पादों की मात्रा घटाने का ‘स्मार्ट’ तरीका अपनाया है, जिससे उपभोक्ताओं को कम कीमत पर कम सामान मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई भी बढ़ सकती है, जो भविष्य में आम उपभोक्ताओं के लिए और भी बड़े झटके का संकेत दे रही है।

