सीएम सादगी सिखाते रहे, अफसर गाड़ियां अटैच कराते रहे… अधिकारियों के लिए मितव्ययिता की अपील बनी मजाक, अधिकारियों के ठेंगे पर सरकार की अपील….!

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देहरादून में सरकार भले ही खर्चों पर लगाम कसने की।अपील कर रही हो, लेकिन शासन के गलियारों में बैठे कुछ अफसरों ने शायद “मितव्ययिता” शब्द को सिर्फ फाइलों तक सीमित मान लिया है। मुख्यमंत्री जहां प्रधानमंत्री की अपील के बाद अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या घटाकर सादगी का संदेश देने में जुटे हैं, वहीं कई अधिकारी सरकारी खजाने पर ऐसा बोझ डाल रहे हैं मानो पेट्रोल-डीजल उनकी निजी जागीर हो।
स्थिति यह है कि शासन में कई अफसरों के पास दो-दो, तीन-तीन विभागों की जिम्मेदारी है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ उन्होंने विभागीय गाड़ियां भी ऐसे “अटैच” करा रखी हैं जैसे कोई लग्जरी कार शोरूम हो। सवाल यह है कि आखिर एक अधिकारी एक समय में कितनी गाड़ियों में बैठेगा? लेकिन यहां मामला सुविधा का कम और रुतबे का ज्यादा दिखाई देता है।
सूत्र बताते हैं कि कई विभागों की गाड़ियां केवल इसलिए अफसरों के यहां संबद्ध हैं ताकि “रॉक गार्डन” से लेकर सचिवालय तक उनका रुतबा कायम रहे। कुछ अधिकारियों के आवास के बाहर सरकारी नंबर प्लेट वाली गाड़ियों की लाइन देखकर ऐसा लगता है जैसे अधिकारियों की कोई कॉन्फ्रेंस चल रही हो । मजे की बात यह है कि इन गाड़ियों का इस्तेमाल कई बार विभागीय काम से ज्यादा निजी दौरे और रसूख दिखाने में होता दिखाई देता है।
सरकार एक तरफ विभागों को खर्च कम करने के निर्देश दे रही है, बिजली-पानी बचाने की अपील की जा रहे हैं, बैठकों में फिजूलखर्ची रोकने की नसीहतें बांटी जा रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ अफसरशाही अपनी “वीआईपी संस्कृति” छोड़ने को तैयार नहीं है। हर गाड़ी के साथ ड्राइवर, ईंधन, मेंटेनेंस और अन्य खर्च जुड़ा होता है। ऐसे में एक ही अधिकारी के पास कई गाड़ियां अटैच होना सीधे-सीधे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है।
विडंबना देखिए कि आम जनता से टैक्स के पैसे बचाने की अपील की जाती है, लेकिन उन्हीं पैसों से चलने वाली सरकारी गाड़ियां अफसरों की सुविधा और शान बढ़ाने में लगी हैं। सरकारी फाइलों में मितव्ययिता की नीति चमकती है, मगर जमीनी हकीकत में अफसरों की गाड़ियों का काफिला उस नीति का मजाक उड़ाता नजर आता है।
राजनीतिक गलियारों में भी अब यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि जब मुख्यमंत्री खुद सादगी का संदेश दे रहे हैं तो फिर अफसरशाही पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही? आखिर ऐसा कौन सा काम है जिसके लिए एक अधिकारी को कई विभागों की गाड़ियां चाहिए? क्या यह सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग नहीं माना जाना चाहिए?
फिलहाल उत्तराखंड में मितव्ययिता की नीति और अफसरों की लग्जरी लाइफस्टाइल के बीच बड़ा विरोधाभास साफ दिखाई दे रहा है। जनता यह जरूर पूछ रही है कि आखिर सरकार की सादगी सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगी या फिर अफसरों के “चार पहियों वाले शौक” पर भी कभी ब्रेक लगेगा।