हिमालय से महासागरों तक मंडराया संकट: अनियंत्रित पर्यटन और ग्लोबल वार्मिंग से बिगड़ा संतुलन

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देहरादून। मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार के कारण आज प्रकृति के दो सबसे मजबूत स्तंभ हिमालयी पर्वतमालाएं और महासागर एक साथ गहरे संकट का सामना कर रहे हैं। देहरादून और नई दिल्ली से सामने आई वैज्ञानिक रिपोर्टों के मुताबिक, अनियंत्रित सैलानियों की भारी भीड़ और अनियोजित कंक्रीट निर्माण से जहां हिमालय की चोटियां तबाही की ओर बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ समुद्र के पानी में तपन के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए हैं। इस स्थिति से हमारे पर्वतीय जीवन और समुद्री जैव विविधता दोनों पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन के अत्यधिक दबाव से नाजुक पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट और आईएमआई की संयुक्त रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत के हिमालयी राज्यों में हर साल करीब 40 करोड़ पर्यटक पहुंच रहे हैं। हालांकि देश की अर्थव्यवस्था में हिमालय का योगदान 21.5 फीसदी है और इससे लाखों परिवारों की रोजी-रोटी चलती है, लेकिन इस बेहिसाब बोझ से पहाड़ की सहनशक्ति जवाब दे रही है।

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रिपोर्ट में इस कड़वे सच का भी खुलासा किया गया है कि पर्यटन से मिलने वाले कुल आर्थिक मूल्य का केवल पांच प्रतिशत हिस्सा ही स्थानीय पर्वतीय राज्यों को वापस मिल पाता है। जबकि अनियंत्रित पर्यटन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं की भारी कीमत पूरी तरह इन्हीं पहाड़ी राज्यों को उठानी पड़ती है। पर्यटकों की अनियंत्रित आमद के कारण कचरा प्रबंधन, पानी की किल्लत, सीवेज की गंभीर समस्या और ढलानों पर बेतरतीब निर्माण से ऊंचे हिमालयी घास के मैदानों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है।

हिमालय को इस तबाही से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल में तुरंत बदलाव करने की जरूरत बताई है। विशेषज्ञों की सलाह है कि अनियंत्रित पर्यटन पर तत्काल अंकुश लगाकर पर्यावरण-अनुकूल इको-टूरिज्म, पारंपरिक पद्धतियों और जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाए। इसके अलावा, पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का सही आकलन करने, पर्यटन की कमाई का बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे को सुधारने में लगाने और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में हिमालय के पर्यावरणीय नुकसान का विशेष ध्यान रखने की सिफारिश की गई है।

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दूसरी ओर, नई दिल्ली से मिली रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के महासागर इस साल असाधारण गर्मी की चपेट में हैं। ‘क्लाइमेट सेंट्रल’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में वैश्विक समुद्री सतह का तापमान लगातार रिकॉर्ड स्तर से ऊपर बना हुआ है। 2 जून से ही ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर महासागरों का तापमान अभूतपूर्व रूप से ऊंचा दर्ज किया जा रहा है, जो 23 अगस्त को 21.24 डिग्री सेल्सियस के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। वैज्ञानिकों की मानें तो इस बार समुद्र में बढ़े हुए तापमान की यह स्थिति लगातार 100 दिनों से अधिक रहने का नया रिकॉर्ड बना सकती है।

समुद्री पानी की इस अत्यधिक तपन का सबसे खतरनाक और सीधा असर कोरल रीफ यानी प्रवाल भित्तियों पर साफ देखा जा रहा है। लंबे समय तक गर्म पानी में रहने के कारण कोरल अपने साथ रहने वाले सूक्ष्म शैवालों को बाहर निकाल देते हैं, जिससे प्रवाल विरंजन होने लगता है। यदि समुद्र का तापमान लंबे समय तक इसी तरह बढ़ा रहा, तो कैल्शियम कार्बोनेट से बनी ये जलमग्न चट्टानें पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं, जिससे उनके सहारे पनपने वाली हजारों समुद्री प्रजातियों का जीवन समाप्त हो जाएगा।

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वैज्ञानिकों के सटीक अनुमानों के अनुसार, मानवीय गतिविधियों से उत्सर्जित होने वाली अतिरिक्त गर्मी का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा अकेले महासागरों ने सोखा है। पानी के गर्म होने से समुद्री जीवों के प्राकृतिक आवास और उनके व्यवहार में तेजी से बदलाव आ रहा है। कई प्रजातियों की मछलियां अपने अनुकूल तापमान की तलाश में ठंडे जलक्षेत्रों की तरफ पलायन कर रही हैं, जिससे उनके प्रजनन चक्र और खाद्य श्रृंखला पर बुरा असर पड़ रहा है।

पहाड़ों से लेकर समुद्र तक गहराता यह पर्यावरणीय असंतुलन साफ चेतावनी दे रहा है कि यदि समय रहते पर्यटन प्रबंधन, ठोस पर्यावरणीय नीतियों और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पूरी मानव सभ्यता को इसके भयानक दुष्परिणाम भुगतने होंगे।