उत्तराखंड के विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थलों को पूरी तरह स्वच्छ, सुंदर और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए राज्य सरकार एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी कर रही है। हाल ही में आयोजित ‘उत्तराखंड अर्बन सैनिटेशन कॉन्क्लेव’ में यह बात सामने आई है कि राज्य सरकार देवभूमि के प्रमुख धामों को कचरा मुक्त करने के लिए अमरनाथ यात्रा के बेहद सफल और आजमाए हुए स्वच्छता मॉडल को अपना सकती है।
इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत प्रदेश के केदारनाथ मंदिर, यमुनोत्री धाम, पूर्णागिरी मंदिर और तुंगनाथ मंदिर जैसे प्रमुख और अत्यधिक भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थलों में जल्द ही ‘स्वच्छ तीर्थ मॉडल’ को लागू किया जा सकता है। कॉन्क्लेव के दौरान स्वाहा रिसोर्स मैनेजमेंट कंपनी के प्रतिनिधियों ने इस विशेष मॉडल का एक विस्तृत प्रस्तुतीकरण शहरी विकास विभाग के सामने रखा, जिसमें यह दिखाया गया कि कैसे अमरनाथ यात्रा के दौरान सिंगल-यूज प्लास्टिक पर कड़ाई से रोक लगाकर और बेहतर प्रबंधन अपनाकर कचरे की मात्रा में करीब 45 प्रतिशत तक की भारी कमी लाई गई थी।
इस प्रस्तुतीकरण पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए शहरी विकास विभाग के सचिव नितेश झा ने स्पष्ट किया है कि स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को लेकर जो भी प्रोजेक्ट और रणनीतियां सबसे बेहतर होंगी, उन्हें राज्य हित में और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूरी तरह लागू किया जाएगा।
उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए इस ‘स्वच्छ तीर्थ मॉडल’ को राज्य में मुख्य रूप से चार सुनियोजित चरणों में लागू करने का खाका तैयार किया जा सकता है। इस महा-अभियान के तहत तय किए गए चार मुख्य पड़ावों में योजना निर्माण, आधारभूत ढांचा , डिजिटल मॉनिटरिंग और सामुदायिक भागीदारी शामिल हैं। पहले चरण में प्लास्टिक के विकल्पों और कचरा संग्रहण की मजबूत योजना बनेगी, जबकि दूसरे चरण में आधुनिक डस्टबिन और रीसाइक्लिंग यूनिट्स जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाएगा।
वहीं, डिजिटल मॉनिटरिंग के जरिए संवेदनशील रास्तों पर कचरे की स्थिति की लाइव ट्रैकिंग की जाएगी और अंतिम चरण में स्थानीय व्यापारियों, घोड़े-खच्चर संचालकों व श्रद्धालुओं को इस अभियान से सीधे जोड़कर एक जन-आंदोलन का रूप दिया जाएगा।
सरकार का मुख्य उद्देश्य सिंगल-यूज प्लास्टिक की बोतलों, रैपर्स और थैलियों पर कड़ा प्रतिबंध लगाकर चारधाम यात्रा मार्ग को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त बनाना है, ताकि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को देवभूमि में न सिर्फ आध्यात्मिक शांति मिले बल्कि एक स्वच्छ, दिव्य और स्वच्छ वातावरण का अहसास भी हो।

