संस्कृति विभाग की गजब सोच….. “बोर्ड सुधारने का बजट नहीं, महोत्सवों में करोड़ों सही!”

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देहरादून। उत्तराखंड की संस्कृति बचाने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे कंधे इन दिनों शायद इतने व्यस्त हैं कि अपने ही विभाग के बोर्ड पर लिखे “उत्तराखंड” को बचाना भूल गए। यह कोई व्यंग्य नहीं, बल्कि संस्कृति विभाग की उस सच्चाई का आईना है जो उसके दफ्तर के बाहर टंगे बोर्ड से साफ झलक रही है। जिस विभाग को लोकसंस्कृति, लोकभाषा, परंपराएं और राज्य आंदोलन की विरासत को संजोने का दायित्व मिला है, वह अपने कार्यालय की पहचान तक दुरुस्त नहीं रख पा रहा।
संस्कृति निदेशालय के बाहर लगा बोर्ड मानो खुद चीख-चीख कर कह रहा हो कि विभाग का ध्यान संस्कृति से ज्यादा चमक-दमक वाले आयोजनों में है। बोर्ड की हालत देखकर ऐसा लगता है जैसे वर्षों से किसी अधिकारी की नजर उस पर पड़ी ही नहीं। शायद इसलिए भी क्योंकि यह कोई करोड़ों का प्रोजेक्ट नहीं, जिसमें टेंडर निकलें, मंच सजें, होर्डिंग लगें और सरकारी खर्च का लंबा-चौड़ा हिसाब बने। यह तो बस एक साधारण बोर्ड है, जिसकी मरम्मत या बदलाव में न बड़ी फाइलें चलेंगी और न ही बड़े आयोजन जैसा “ग्लैमर” मिलेगा। विडंबना देखिए, विभाग हर साल संस्कृति बचाने के नाम पर बड़े-बड़े समारोह आयोजित करता है। लोक कलाकारों के नाम पर मंच सजते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की लंबी सूची बनती है, अधिकारियों की भागदौड़ दिखाई देती है और सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। लेकिन उसी विभाग के मुख्यालय का बोर्ड यह बताने के लिए काफी है कि जमीनी स्तर पर विभाग की प्राथमिकताएं क्या हैं। उत्तराखंड आंदोलन की आत्मा रही अपनी पहचान और अपनी संस्कृति। पहाड़ की बोली, लोकगीत, रीति-रिवाज और विरासत को संरक्षित करने के लिए अलग संस्कृति विभाग बनाया गया ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें। लेकिन जब विभाग खुद अपनी पहचान के प्रतीक “उत्तराखंड” शब्द को सम्मानपूर्वक नहीं लिखवा पा रहा, तब सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर संस्कृति संरक्षण का दावा कितना ईमानदार है।
यह सिर्फ एक बोर्ड की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की मानसिकता का नमूना है। सरकारी दफ्तरों में अक्सर छोटी लेकिन जरूरी चीजों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, क्योंकि उनमें प्रचार की गुंजाइश नहीं होती। अधिकारी उन योजनाओं में ज्यादा रुचि लेते हैं जहां फोटो खिंच सके, प्रेस विज्ञप्ति जारी हो सके और सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटी जा सके। शायद यही वजह है कि विभाग के बाहर लगा टूटा-फूटा या गलत बोर्ड किसी को दिखाई नहीं देता।मजेदार बात यह है कि यही विभाग प्रदेशभर में सांस्कृतिक चेतना फैलाने के लिए अभियान चलाता है। गांवों में लोककला बचाने की बातें होती हैं, स्कूलों में संस्कृति संरक्षण के भाषण दिए जाते हैं, लेकिन अपने ही कार्यालय की दुर्दशा सुधारने का वक्त किसी के पास नहीं। लगता है विभाग ने यह मान लिया है कि संस्कृति सिर्फ मंचों पर गाए जाने वाले गीतों और आयोजनों की रंगीन रोशनी तक सीमित है।
दरअसल, किसी भी विभाग की गंभीरता उसके छोटे-छोटे कामों से झलकती है। यदि कार्यालय का बोर्ड तक सही नहीं है तो फिर फाइलों में संस्कृति संरक्षण की योजनाएं कितनी संवेदनशीलता से चल रही होंगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। यह वही सरकारी सिस्टम है जहां छोटी जरूरतों के लिए बजट नहीं होता, लेकिन बड़े आयोजनों के लिए धन की कभी कमी नहीं आती।
संस्कृति विभाग का यह बोर्ड अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुका है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब विभाग अपने नाम की गरिमा नहीं संभाल पा रहा तो लोकसंस्कृति की विरासत को कैसे बचाएगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि संस्कृति संरक्षण अब सिर्फ सरकारी आयोजन और बजट खर्च करने का माध्यम बनकर रह गया है।

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जरूरत इस बात की है कि विभाग पहले अपने घर की संस्कृति और व्यवस्था को दुरुस्त करे। क्योंकि संस्कृति केवल भाषणों और आयोजनों से नहीं बचती, बल्कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से बचती है। और जब जिम्मेदार लोग ही अपने दफ्तर के बोर्ड को गंभीरता से नहीं लेते, तब जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उत्तराखंड की संस्कृति सचमुच सुरक्षित हाथों में है भी या नहीं।

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