देहरादून। उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी गढ़वाल जिलों में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों की किस्मत बदलने वाली एक बड़ी परियोजना पर जमीन पर काम शुरू हो गया है। सोंग नदी घाटी क्षेत्र में देश के अपनी तरह के अनूठे कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिल गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य लक्ष्य पर्यावरण की रक्षा, जल सुरक्षा सुनिश्चित करना और स्थानीय किसानों की आजीविका को सीधे तौर पर मजबूत करना है।
इस ग्राउंड-ब्रेकिंग प्रोजेक्ट को राज्य की ‘स्प्रिंग एंड रिवर रेजुवेनेशन अथॉरिटी’ की देखरेख में नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेज की टीम धरातल पर उतार रही है। परियोजना के पहले चरण के तहत सोंग नदी के कैचमेंट एरिया में आने वाले किसानों के खेतों और सामुदायिक जमीनों की मिट्टी का व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण शुरू कर दिया गया है।
‘सारा’ की एसीईओ कहकशा नसीम ने बताया कि वैज्ञानिक पद्धति से मिट्टी के नमूने एकत्र कर जमीन में मौजूद जैविक कार्बन की मात्रा और सॉइल हेल्थ के आधारभूत आंकड़े तैयार किए जा रहे हैं। यही डेटा बेस भविष्य में इस पूरी घाटी के लिए कार्बन क्रेडिट की दर और संख्या निर्धारित करने का मुख्य आधार बनेगा। इस योजना के तहत कृषि-वानिकी, बड़े पैमाने पर वनीकरण और पारंपरिक जल संरक्षण के कार्य किए जाएंगे, जो वातावरण से कार्बन सोखने का काम करेंगे।
इस पूरी कवायद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पर्यावरण को शुद्ध करने के बदले मिलने वाले कार्बन क्रेडिट से जो भी मोटी कमाई होगी, उसका एक बड़ा हिस्सा सीधे स्थानीय किसानों और ग्रामीण समुदायों को मिलेगा। इसके अलावा, परियोजना में ‘नॉन-एनबीएस’ घटकों के तहत ग्रामीण इलाकों में उन्नत चूल्हे बांटने और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने वाले काम भी शामिल किए गए हैं, ताकि घरेलू स्तर पर भी कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम किया जा सके।
पर्यावरण और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह संयुक्त प्रयास उत्तराखंड के सूखते जल स्रोतों को संजीवनी देने का काम करेगा। यह प्रोजेक्ट न केवल वैश्विक जलवायु परिवर्तन की जंग में मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि देवभूमि के सीधे-सादे किसानों को ग्लोबल वार्मिंग की लड़ाई में एक बड़ा और आर्थिक रूप से समृद्ध वैश्विक हिस्सेदार बना देगा।

