उत्तराखंड हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: मदरसा शिक्षकों को वेतन न देने पर सरकार को लगाई फटकार

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के मदरसों में कार्यरत शिक्षकों को पिछले कई वर्षों से वेतन व मानदेय का भुगतान न किए जाने के मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। अदालत ने इस संबंध में दायर अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है और पूर्व के अदालती आदेशों का पालन न होने पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है।

न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई में अदालत ने सरकार से साफ तौर पर स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर न्यायिक आदेशों के बावजूद शिक्षकों का देय वेतन अब तक क्यों नहीं दिया गया? इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को आगामी 10 जून तक इस पूरे मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।

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यह पूरा मामला मदरसा शिक्षक धनी राम, मुकेश कुमार और अन्य द्वारा दायर अवमानना याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्ति एक विशेष योजना के तहत वर्ष 2006 और 2008 में मदरसों में पढ़ाने के लिए ₹12,000 प्रति माह के मानदेय पर की गई थी।

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वर्ष 2015 तक उन्हें यह मानदेय नियमित रूप से मिला, लेकिन अप्रैल 2016 से अचानक उनका भुगतान पूरी तरह बंद कर दिया गया, जिसके बाद से वे लगातार अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उच्च न्यायालय ने पूर्व में 7 अक्टूबर 2025 को सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को एक तीन सदस्यीय समिति गठित करने का आदेश दिया था।

इस समिति की अध्यक्षता राज्य सरकार के एक अतिरिक्त सचिव को करनी थी और इसमें जिला अल्पसंख्यक अधिकारी को भी शामिल किया गया था। समिति का मुख्य कार्य यह तय करना था कि याचिकाकर्ता मानदेय पाने के हकदार हैं या नहीं, और पात्रता सिद्ध होने पर दो महीने के भीतर उनकी बकाया राशि का भुगतान करना था।

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अदालत के इस स्पष्ट आदेश को बीते नौ महीने से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन आज तक शिक्षकों को उनकी लंबित राशि नहीं मिल सकी है, जिसके बाद उन्होंने पुनः अदालत का दरवाजा खटखटाया है।