उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्वर्गाश्रम जोंक नगर पंचायत में वित्तीय अनियमितताओं पर राज्य सरकार से मांगा जवाब

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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पौड़ी गढ़वाल जिले की स्वर्गाश्रम जोंक नगर पंचायत में हुए कथित वित्तीय घोटालों को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और संबंधित नगर पंचायत को आगामी तीन सप्ताह के भीतर अदालत में अपना पक्ष स्पष्ट करने के निर्देश जारी किए हैं।

यमकेश्वर निवासी शुभम झा द्वारा दायर इस जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि पिछले 33 महीनों के दौरान इस नगर पंचायत में विकास कार्यों के लिए आवंटित धनराशि का भारी दुरुपयोग करते हुए पांच करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय अनियमितताएं की गई हैं।

याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि आरटीआई के माध्यम से मिले दस्तावेजों से इस गड़बड़ी का खुलासा हुआ है, लेकिन जब उन्होंने इसकी शिकायत सीएम पोर्टल और उच्च अधिकारियों से की, तो आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की और पुलिस में उनकी शिकायत तक दर्ज नहीं होने दी।

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जीएसटी सर्विस चार्ज में निष्पक्ष जांच की मांग

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप निर्माण कार्यों में लगने वाले जीएसटी से जुड़े सर्विस चार्ज को लेकर लगाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, नियमानुसार सर्विस चार्ज तीन से सात प्रतिशत के बीच होना चाहिए था, लेकिन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए 21 प्रतिशत तक सर्विस चार्ज दर्शाकर फर्जी बिल प्रस्तुत किए गए हैं।

इन साक्ष्यों के आधार पर याचिकाकर्ता ने अदालत से पूरे घोटाले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की गुहार लगाई है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने अदालत में इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा कि नगर पंचायत में कोई वित्तीय अनियमितता नहीं हुई है।

सरकार का तर्क था कि यदि किसी को शिकायत थी तो उसे सक्षम उच्च अधिकारियों के पास जाना चाहिए था, न कि सोशल मीडिया के माध्यम से अधिकारियों पर गलत आरोप लगाने चाहिए थे, इसलिए इस जनहित याचिका को खारिज किया जाना चाहिए। हालांकि, न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद वर्तमान स्थिति साफ करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है।

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हरिद्वार नगर निगम के खिलाफ हाईकोर्ट सख्त

इसी समाचार पत्र में प्रकाशित एक अन्य मामले में, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हरिद्वार नगर निगम क्षेत्र में विकास कार्य पूरा करने के बावजूद ठेकेदारों का भुगतान रोकने पर बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने करीब दो दर्जन से अधिक ठेकेदारों द्वारा दायर याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए उनका निस्तारण कर दिया है।

अदालत ने सभी याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे दो सप्ताह के भीतर अपना नया प्रत्यावेदन हरिद्वार नगर निगम के नगर आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके साथ ही अदालत ने नगर आयुक्त को कड़े आदेश दिए हैं कि वे इन प्रत्यावेदनों पर कानून के अनुसार विचार करते हुए आठ सप्ताह के भीतर आवश्यक कार्रवाई और अंतिम निर्णय सुनिश्चित करें।

समय पर काम पूरा होने के बाद भी नहीं मिला पैसा

याचिकाकर्ता संजय कुमार समेत अन्य ठेकेदारों ने उच्च न्यायालय को बताया कि हरिद्वार नगर निगम ने विभिन्न क्षेत्रों में विकास और निर्माण कार्यों के लिए निविदाएं जारी की थीं, जिसके तहत उन्होंने वर्ष 2024-25 के दौरान सभी आवंटित कार्यों को तय समय सीमा के भीतर पूरी गुणवत्ता के साथ संपन्न कर दिया था।

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इसके बावजूद नगर निगम प्रशासन द्वारा उन्हें किए गए कार्यों का भुगतान अब तक नहीं किया गया है। ठेकेदारों ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि इस बकाया राशि के भुगतान के लिए उन्होंने मुख्य नगर आयुक्त को कई बार लिखित प्रत्यावेदन दिए, लेकिन अधिकारियों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही लंबित राशि जारी की।

इसी वजह से परेशान होकर ठेकेदारों को अदालत की शरण लेनी पड़ी, जहां उन्होंने मांग की है कि नगर निगम को तुरंत भुगतान के आदेश दिए जाएं और इस देरी के एवज में देय राशि पर 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिलाया जाए।

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