उत्तराखंड में शिक्षकों के तबादला एक्ट के तहत इस वर्ष अनिवार्य तबादले नहीं किए जाएंगे, जो कि प्रदेश में लगातार दूसरा ऐसा साल है जब इस नियम को स्थगित रखा गया है। शासन ने इस बार केवल शिक्षकों और कर्मचारियों के अनुरोध के आधार पर ही तबादले करने का निर्णय लिया है। इस महत्वपूर्ण फैसले के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक विशेष समिति का गठन किया गया था, जिसकी सिफारिशों को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी मंजूरी दे दी है।
हालांकि तबादला एक्ट के नियमों के अनुसार अनुरोध के आधार पर होने वाले तबादलों के लिए 30 अप्रैल तक आवेदन मांग लिए जाने चाहिए थे, लेकिन विभिन्न प्रशासनिक कारणों से इस बार समय पर आवेदन नहीं मांगे जा सके। इसके बावजूद, कार्मिक विभाग के सचिव शैलेश बगौली ने स्पष्ट किया है कि जिन पात्र शिक्षकों और कार्मिकों के अनुरोध के आधार पर तबादले होने हैं, उनके लिए जल्द ही आधिकारिक आदेश जारी कर दिया जाएगा।
इस बार कोई प्रतिशत सीमा तय नहीं
राज्य में इस बार शिक्षकों और कर्मचारियों के तबादलों के लिए शासन स्तर से कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की गई है। पूर्व के वर्षों में यह व्यवस्था रही है कि कुल पदों के मुकाबले कभी 10 प्रतिशत तो कभी 15 प्रतिशत तबादलों की सीमा तय की जाती थी, लेकिन इस साल इस तरह की किसी भी बाध्यता को हटा दिया गया है।
सचिव कार्मिक शैलेश बगौली के अनुसार, अब पात्र कार्मिकों के रिक्त पदों की उपलब्धता को देखते हुए अनिवार्य और अनुरोध दोनों ही आधारों पर आवश्यक तबादले सुचारू रूप से किए जा सकेंगे।
कोर्ट में विचाराधीन मामले का असर
तबादला एक्ट की धारा 27 के तहत कई शिक्षकों ने ट्रांसफर के लिए अपनी ओर से आवेदन किए हैं, लेकिन उनके स्थानांतरण को लेकर अभी तक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है। इस विषय को लेकर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में पहले ही एक उच्च स्तरीय बैठक संपन्न हो चुकी है।
सचिव कार्मिक शैलेश बगौली ने इस संबंध में बताया कि शिक्षकों के इस साल दुर्गम से सुगम और सुगम से दुर्गम क्षेत्रों में किए जाने वाले नियमित तबादले लागू नहीं होंगे। इसका मुख्य कारण यह है कि संबंधित प्रकरण वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है, जिसके चलते इस आधार पर होने वाले अनिवार्य तबादलों पर रोक लगी रहेगी और केवल व्यक्तिगत अनुरोध वाले मामलों का ही जल्द निस्तारण किया जाएगा।

