देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं और वन्यजीवों के रेस्क्यू ऑपरेशन्स को बेहतर बनाने के लिए वन विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। विभाग ने शासन को एक आधिकारिक प्रस्ताव भेजकर 5 नए पशु चिकित्सकों की तुरंत मांग की है। इसके साथ ही, विभाग वर्तमान में तैनात डॉक्टरों को वन विभाग में ही समायोजित करने का प्रयास कर रहा है।
अपर प्रमुख वन संरक्षक डॉ. विवेक पांडे के मुताबिक, इस प्रशासनिक फैसले का सीधा असर राज्य के विभिन्न रेस्क्यू सेंटरों और चिड़ियाघरों में रह रहे वन्यजीवों की सेहत पर पड़ेगा। विभाग वन्यजीवों की बेहतर चिकित्सा और आपातकालीन रेस्क्यू व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है।
दरअसल, प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में मानव और वन्यजीवों के बीच आपसी संघर्ष की घटनाएं लगातार तेज हो रही हैं। हिंसक या जख्मी वन्यजीवों को सुरक्षित पकड़ने के लिए चलाए जाने वाले रेस्क्यू अभियानों में विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की सबसे बड़ी भूमिका होती है। इसके अलावा, ढेला समेत अन्य रेस्क्यू सेंटरों और चिड़ियाघरों में बचाए गए वन्यजीवों को रखा जाता है।
इन सभी रेस्क्यू सेंटरों में रहने वाले वन्यजीवों की सेहत की लगातार निगरानी करनी होती है। वर्तमान में वन विभाग के भीतर पशु चिकित्सकों के कुल नौ पद स्वीकृत हैं। इन पदों के मुकाबले विभाग को पशु पालन विभाग की तरफ से प्रतिनियुक्ति पर केवल आठ पशु चिकित्सक ही मिल सके हैं। यही वजह है कि वन विभाग मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पांच और नए डॉक्टरों की जरूरत महसूस कर रहा है।
नए डॉक्टरों की मांग और पुरानों का समायोजन
वन विभाग की ओर से शासन को भेजे गए पत्र में अनुरोध किया गया है कि वर्तमान में जो पशु चिकित्सक विभाग में काम कर रहे हैं, उन्हें यहीं समायोजित कर लिया जाए। अगर तकनीकी कारणों से तुरंत समायोजन संभव नहीं है, तो उनकी प्रतिनियुक्ति की अवधि को आगे बढ़ा दिया जाए। इसके साथ ही पांच नए डॉक्टरों को भी जल्द विभाग से जोड़ा जाए।
इस संबंध में अपर प्रमुख वन संरक्षक डॉ. विवेक पांडे ने बताया कि वर्तमान में जो डॉक्टर विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें वन्यजीवों से जुड़ा एक बहुत अच्छा और लंबा अनुभव हो चुका है। विभाग उनके इस जमीनी और व्यावहारिक अनुभव का लाभ आगे भी उठाना चाहता है। इसी को देखते हुए समायोजन समेत अन्य जरूरी बिंदुओं पर शासन को अंतिम मंजूरी के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

