उत्तराखंड की प्रसिद्ध चारधाम यात्रा मार्ग पर इस बार मौसम के मिजाज ने श्रद्धालुओं के साथ-साथ वैज्ञानिकों की भी चिंता बढ़ा दी है। चारों धामों में बारिश और बर्फबारी का सिलसिला थमते ही पारा तेजी से चढ़ने लगा है, जिससे यात्रा रूट पर पड़ने वाले पहाड़ी क्षेत्रों का सुकून छिन गया है। वर्तमान में यहाँ का तापमान सामान्य से करीब तीन से पांच डिग्री सेल्सियस तक ऊपर चल रहा है, जिसके चलते भीषण गर्मी और ट्रैफिक जाम के बीच श्रद्धालुओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
मौसम वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ों पर अचानक बढ़ रही इस गर्मी की सबसे बड़ी वजह देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं और उनके वाहनों की संख्या में लगातार हो रही रिकॉर्ड बढ़ोतरी है। इस मानवीय दबाव और वाहनों के धुएं के कारण संवेदनशील पहाड़ी इलाकों का पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और गर्मी के सभी पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं।
चारधाम क्षेत्र में चढ़ते पारे का पूरा गणित
मौसम विज्ञान केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक, चारों धामों में इस समय औसत तापमान 18 से 22 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया जा रहा है, जिसमें यमुनोत्री धाम सबसे गर्म रिकॉर्ड किया गया है। यमुनोत्री में जहाँ सामान्यतः तापमान 18 से 20 डिग्री रहता था, वहीं अब यह बढ़कर 24 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है।
इसी तरह केदारनाथ धाम में मई-जून के महीने में औसत तापमान अमूमन 10 से 12 डिग्री रहता था, जो इन दिनों बढ़कर 15 से 18 डिग्री सेल्सियस तक जा रहा है। बद्रीनाथ धाम में भी सामान्य औसत 16 से 19 डिग्री की जगह पारा 22 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच चुका है। इसके अलावा यात्रा के मुख्य पड़ावों और कस्बों में भी गर्मी का प्रकोप साफ देखा जा सकता है, जहाँ रुद्रप्रयाग में अधिकतम तापमान 36 डिग्री, चमोली में 33 डिग्री, कर्णप्रयाग और बड़कोट में 32 डिग्री तथा उत्तरकाशी में 30 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है।
पहाड़ों पर तापमान बढ़ने के मुख्य कारण
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान के एक शोध के अनुसार, बीते एक दशक में गंगोत्री और यमुनोत्री मार्ग पर आने वाले वाहनों की संख्या दोगुनी से भी अधिक हो गई है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फ्रंटियर्स इन मरीन रिसर्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर 2021 से दिसंबर 2025 के बीच उत्तराखंड का न्यूनतम तापमान 6.3 डिग्री से बढ़कर 8.3 डिग्री सेल्सियस हो चुका है।
पहाड़ों पर इस तपन के पीछे कई प्रमुख वजहें हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण ग्लेशियरों के ऊपर बर्फ का कवर क्षेत्र लगातार घटना और कंक्रीट के बुनियादी ढांचे का तेजी से निर्माण होना है। इसके अलावा, सड़कों को चौड़ा करने के लिए भारी डीजल मशीनों का अत्यधिक इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे निकलने वाली गर्मी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है। साथ ही, जंगलों का घनत्व घटने के कारण वनस्पति की सीमा और बर्फ की सीमा धीरे-धीरे ऊपर की तरफ खिसक रही है, जो भविष्य के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
तेजी से पीछे हट रहे हैं पवित्र ग्लेशियर
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के रजिस्ट्रार प्रवीण कुमार ने अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ (नेचर पत्रिका) के हवाले से एक बेहद चिंताजनक जानकारी साझा की है। वर्ष 1990 से 2020 तक के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि चारधाम के तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण सदियों पुराने ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघलकर पीछे खिसक रहे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, गंगोत्री ग्लेशियर सबसे तेज गति से यानी लगभग 22.3 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहा है।
इसी तरह यमुनोत्री ग्लेशियर 20 मीटर प्रति वर्ष, बद्रीनाथ ग्लेशियर 17.3 मीटर प्रति वर्ष और बाबा केदारनाथ का ग्लेशियर 14.1 मीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से सिकुड़ रहा है। मौसम निदेशक डॉ. सी.एस. तोमर ने चेतावनी दी है कि यदि इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए पहाड़ों पर तुरंत ठोस और कड़े इंतजाम नहीं किए गए, तो आने वाले समय में उत्तराखंड की पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।

