देहरादून। राजधानी देहरादून की सड़कों पर ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के बड़े-बड़े दावे भले ही किए जाते हों, लेकिन सहस्त्रधारा रोड पर पहुंचते ही ये दावे अक्सर जाम में फंसते नजर आते हैं। शहर के सबसे व्यस्त मार्गों में शुमार सहस्त्रधारा रोड पर एक शराब की दुकान के आसपास बेतरतीब खड़े वाहन रोजाना यातायात व्यवस्था की परीक्षा लेते दिखाई देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि परीक्षा जनता देती है और फजीहत सिस्टम की होती है। शराब की दुकान पर खरीदारी के लिए आने वाले लोग अपने वाहनों को सड़क किनारे जहां जगह मिली, वहीं खड़ा कर देते हैं। नतीजा यह कि सड़क की चौड़ाई कागजों में भले पूरी दिखाई दे, लेकिन जमीन पर वाहनों की कतारें रास्ता संकरा कर देती हैं। देखते ही देखते सहस्त्रधारा रोड पर जाम का झाम खड़ा हो जाता है और राहगीरों को कुछ मिनटों का सफर तय करने में लंबा वक्त लग जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार सिस्टम को यह सब दिखाई नहीं देता? क्या किसी व्यस्त सड़क पर शराब की दुकान के बाहर वाहनों की पार्किंग और उससे पैदा होने वाली यातायात समस्या की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए? या फिर आबकारी विभाग से लेकर यातायात पुलिस तक सबकी निगाहें उस वक्त बंद हो जाती हैं, जब दुकान का शटर खुलता है?
हालात यहां तक पहुंच रहे हैं कि जाम में फंसे लोग अपनी गाड़ियों से उतर नहीं सकते तो मजबूरन गाड़ी में बैठे-बैठे ही पूरे मंजर की तस्वीर खींचने लगते हैं। यही तस्वीरें फिर सोशल मीडिया पर पहुंचती हैं और व्यवस्था की जमकर फजीहत कराती हैं। यानी सड़क पर जाम लगता है, जनता परेशान होती है और आखिर में सोशल मीडिया पर सिस्टम का ट्रैफिक जाम खुलता है।विडंबना देखिए दुकान के बाहर लगने वाले जाम की कीमत आम जनता अपने समय, ईंधन और परेशानी से चुकाती है। दुकान चलती रहे, बिक्री होती रहे, मौज होती रहे… मगर सड़क चलेगी कैसे, यह सवाल शायद किसी फाइल में दबा पड़ा है। यहां सवाल शराब बेचने का नहीं, बल्कि व्यवस्था के साथ शराब की दुकान के सह-अस्तित्व का है। अगर दुकान के आसपास पार्किंग की उचित व्यवस्था नहीं है और सड़क पर खड़े वाहनों से लगातार यातायात प्रभावित हो रहा है, तो जिम्मेदार विभाग आखिर कार्रवाई का इंतजार क्यों कर रहे हैं?
सहस्त्रधारा रोड के लोग शायद अब यही पूछ रहे हैं—क्या जाम खुलवाने के लिए भी किसी वीआईपी के गुजरने का इंतजार किया जाएगा, या आम आदमी की परेशानी को भी कभी सिस्टम की नजर मिलेगी? क्योंकि फिलहाल तो तस्वीर यही है—शराब की दुकान आबाद है, सड़क बेहाल है और जिम्मेदार सिस्टम बेखबर है।

