72 घंटे में ही फेल हो गया तबादला प्रयोग! स्वास्थ्य विभाग में ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का बदल गया ट्रेलर….

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देहरादून। उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में तबादलों का ताजा अध्याय यह साबित करने के लिए काफी है कि व्यवस्था परिवर्तन के दावे करना आसान है, लेकिन व्यवस्था को समझना और चलाना उससे कहीं ज्यादा कठिन। हाल ही में बड़े उत्साह के साथ जारी की गई सीएमओ तबादला सूची महज 72 घंटे के भीतर ही संशोधन की भेंट चढ़ गई। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर तबादले पहले सोच-समझकर किए गए थे या फिर बाद में उनकी कमियां तलाश की गईं?
स्वास्थ्य विभाग में किए गए तबादलों को शासन स्तर पर बड़े बदलाव के रूप में पेश किया गया था। ऐसा माहौल बनाया गया मानो वर्षों से जमी व्यवस्था को एक झटके में बदल दिया गया हो। लेकिन तीन दिन भी नहीं बीते थे कि आदेशों में संशोधन जारी करना पड़ गया। अब यह संशोधन विभागीय मजबूरी था या शुरुआती आदेशों की खामियों की स्वीकारोक्ति, यह चर्चा का विषय बना हुआ है।
सबसे ज्यादा चर्चा रुद्रप्रयाग और अल्मोड़ा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी पदों को लेकर हो रही है। पहले आदेश में अमित शुक्ला को रुद्रप्रयाग का सीएमओ बनाया गया था, लेकिन संशोधित आदेश में उनकी जगह राजीव पाल को जिम्मेदारी सौंप दी गई। इसी तरह अल्मोड़ा में योगेश पुरोहित का तबादला निरस्त कर दिया गया और उनकी जगह हरीश चंद्र पंत को सीएमओ नियुक्त कर दिया गया।
अब सवाल यह है कि यदि पहले आदेश पूरी तैयारी और मंथन के बाद जारी किए गए थे तो फिर इतनी जल्दी बदलाव की नौबत क्यों आ गई? और यदि बदलाव जरूरी था तो क्या यह माना जाए कि पहली सूची में गंभीर त्रुटियां थीं? विभागीय गलियारों में यही चर्चा सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है।
व्यंग्य यह भी है कि स्वास्थ्य विभाग मरीजों के इलाज से पहले अपने तबादला आदेशों का ही इलाज करने में जुटा दिखाई दे रहा है। जिन अधिकारियों ने नए जिलों में जाने की तैयारी शुरू की होगी, उन्हें शायद यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनका तबादला आदेश किसी दवा के प्रिस्क्रिप्शन की तरह दोबारा संशोधित हो जाएगा।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि यदि सात अधिकारियों के तबादलों में ही 72 घंटे के भीतर बदलाव करना पड़ रहा है तो फिर बड़े स्तर पर प्रशासनिक सुधारों की तस्वीर कैसी होगी? यह घटनाक्रम कहीं न कहीं निर्णय प्रक्रिया की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।
स्वास्थ्य विभाग लंबे समय से डॉक्टरों की कमी, विशेषज्ञ चिकित्सकों के अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में उम्मीद थी कि तबादला प्रक्रिया स्पष्ट रणनीति और दूरदृष्टि के साथ होगी। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर सामने आई है, उसने व्यवस्था परिवर्तन के दावों पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग की यह तबादला कहानी यही संदेश दे रही है कि आदेश जारी करना आसान है, लेकिन उन्हें टिकाऊ बनाना शायद अभी भी सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। व्यवस्था परिवर्तन का नारा तो बुलंद है, मगर तबादला सूची देखकर ऐसा लग रहा है कि व्यवस्था अभी भी खुद को ही समझने की कोशिश कर रही है।