उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाएं इन दिनों लगातार सवालों के घेरे में हैं। एक के बाद एक सामने आ रही घटनाओं ने पूरे हेल्थ सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी उपकरणों की खरीद में गड़बड़ियों के आरोप लगते हैं, तो कभी अनियमितताओं की जांच के आदेश सुर्खियां बनते हैं। लेकिन अब हरिद्वार जनपद के मंगलौर राजकीय चिकित्सालय से सामने आई तस्वीर ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत को और ज्यादा उजागर कर दिया है।
मंगलौर अस्पताल में टीबी के मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचे, लेकिन उन्हें अस्पताल की चौखट पर ही इंतजार करना पड़ा। मरीज पड़े रहे, पर जिम्मेदार डॉक्टर और अधिकारी नदारद दिखाई दिए। हालत ऐसी थी कि अस्पताल में व्यवस्था संभालने वाला कोई नजर नहीं आया। यह दृश्य देखकर कांग्रेस विधायक काजी निजामुद्दीन का पारा भी चढ़ गया। विधायक ने मौके पर पहुंचकर अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर नाराजगी जाहिर की।
हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तंज भी खूब कसे जा रहे हैं। चर्चा यह है कि अगर मामला सत्ता पक्ष के किसी बड़े नेता से जुड़ा होता तो तस्वीर शायद अलग दिखाई देती। डॉक्टरों की टीम तत्काल मौके पर पहुंचती, अधिकारी सक्रिय हो जाते और अस्पताल में अफरा-तफरी के बीच राहत कार्य शुरू हो जाता। लेकिन यहां विपक्ष के विधायक सवाल उठा रहे थे, लिहाजा सिस्टम की सुस्ती भी खुलकर सामने आ गई। सरकारी अस्पतालों की स्थिति अब ऐसी होती जा रही है कि मरीज इलाज से ज्यादा इंतजार का दर्द झेल रहे हैं। सुबह से शाम तक लोग डॉक्टरों की राह देखते रहते हैं, लेकिन कई बार डॉक्टर मीटिंग, निरीक्षण, वीआईपी ड्यूटी या प्रशासनिक व्यस्तताओं का हवाला देकर जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। आम जनता के हिस्से में केवल इंतजार, परेशानी और सफाई ही आती है। स्वास्थ्य विभाग लगातार बड़े-बड़े दावे करता है। बैठकों में व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की बातें होती हैं, योजनाओं की समीक्षा की जाती है और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के निर्देश जारी किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हालात हर बार इन दावों की पोल खोल देते हैं। अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, संसाधनों का अभाव और अधिकारियों की लापरवाही अब आम चर्चा का विषय बन चुकी है। मंगलौर अस्पताल का मामला इसलिए भी ज्यादा गंभीर माना जा रहा है क्योंकि टीबी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों को समय पर इलाज और निगरानी बेहद जरूरी होती है। लेकिन जब मरीज अस्पताल की दहलीज पर ही बेसहारा पड़े रहें और जिम्मेदार सिस्टम गायब मिले तो सवाल उठना लाजिमी है। लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पताल अब “उम्मीद” से ज्यादा “मजबूरी” बनते जा रहे हैं। जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे निजी अस्पतालों का रुख कर लेते हैं, लेकिन गरीब और जरूरतमंद लोगों के पास सरकारी अस्पतालों के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसे में यदि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की यही स्थिति रही तो आने वाले समय में लोगों का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है। फिलहाल मंगलौर अस्पताल की घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग में केवल बैठकों और निर्देशों से काम नहीं चलेगा। जिम्मेदार अधिकारियों और डॉक्टरों की जवाबदेही तय करनी होगी, वरना सरकारी अस्पतालों की बदहाल तस्वीर जनता के विश्वास को लगातार कमजोर करती रहेगी।

