6 घंटे की मैराथन बैठक और कई सवाल: स्वास्थ्य मंत्री ने आखिर स्वास्थ्य निदेशालय से क्या संदेश दिया?
देहरादून। उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने गुरुवार को स्वास्थ्य महानिदेशालय में एक ऐसी मैराथन बैठक ली, जिसकी चर्चा विभागीय गलियारों में देर शाम तक होती रही। चिकित्सा शिक्षा विभाग और स्टेट हेल्थ एजेंसी (SHA) की समीक्षा के नाम पर चली यह बैठक करीब छह घंटे से अधिक समय तक चली। बैठक में मेडिकल कॉलेजों की फैकल्टी की कमी से लेकर आयुष्मान योजना के क्लेम, अस्पतालों की व्यवस्थाओं और तबादला नीति तक तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन बैठक खत्म होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही तैरता रहा कि आखिर स्वास्थ्य मंत्री ने चिकित्सा शिक्षा विभाग और SHA की समीक्षा के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण निदेशालय को ही क्यों चुना?
आमतौर पर चिकित्सा शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली अलग-अलग मानी जाती है। दोनों के अपने कार्यालय, अपनी प्रशासनिक व्यवस्था और अपनी प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में जब मंत्री ने पहली बार दोनों विभागों की संयुक्त समीक्षा की तो विभागीय अधिकारियों के बीच यह चर्चा भी शुरू हो गई कि क्या यह केवल समीक्षा बैठक थी या फिर इसके पीछे कोई बड़ा प्रशासनिक संदेश छिपा हुआ था। बैठक की शुरुआत राज्य के सभी मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्यों के साथ हुई। मंत्री ने मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी को लेकर विस्तार से जानकारी ली। कई कॉलेजों में विशेषज्ञ चिकित्सकों और शिक्षकों के खाली पड़े पदों पर चिंता जताई गई। मंत्री ने स्पष्ट संकेत दिए कि मेडिकल कॉलेज केवल इमारतों से नहीं, बल्कि योग्य फैकल्टी और बेहतर चिकित्सा सेवाओं से पहचाने जाएंगे। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि खाली पदों को भरने और व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की जाए।
सूत्रों के अनुसार मंत्री ने मेडिकल कॉलेज अस्पतालों को आधुनिक और उन्नत चिकित्सा सुविधाओं से लैस करने पर भी जोर दिया। उन्होंने पूछा कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई अस्पताल अभी भी मरीजों को अपेक्षित सेवाएं क्यों नहीं दे पा रहे हैं। कई स्थानों पर उपकरण हैं तो उन्हें चलाने वाले विशेषज्ञ नहीं हैं और जहां विशेषज्ञ हैं वहां संसाधनों की कमी बनी हुई है।
बैठक में तबादलों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। मंत्री ने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए कि स्थानांतरण प्रक्रिया में पारदर्शिता और संवेदनशीलता दोनों का ध्यान रखा जाए। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति नहीं बननी चाहिए कि कोई चिकित्सक या फैकल्टी सदस्य व्यवस्था से नाराज होकर नौकरी छोड़ने का फैसला कर ले। यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के इस्तीफे और निजी संस्थानों की ओर रुख करने की घटनाएं सामने आती रही हैं।
दून मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस छात्रों से जुड़े कथित मेस के घोटाले के मामले पर भी मंत्री का रुख सख्त नजर आया। उन्होंने इस प्रकरण में अब तक अपेक्षित कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई। सवाल उठाया कि जब मामले की गंभीरता इतनी अधिक है तो फिर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गति इतनी धीमी क्यों है। मंत्री की नाराजगी ने साफ संकेत दिया कि इस मामले में आने वाले दिनों में कुछ बड़े फैसले देखने को मिल सकते हैं।
दूसरी ओर आयुष्मान योजना की समीक्षा के दौरान अस्पतालों के लंबित क्लेम और भुगतान की प्रक्रिया पर विशेष चर्चा हुई। मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि क्लेम सेटलमेंट में अनावश्यक देरी समाप्त की जाए ताकि अस्पतालों और मरीजों दोनों को परेशानी का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि योजना का उद्देश्य लोगों को राहत देना है, न कि उन्हें फाइलों और भुगतान की प्रतीक्षा में उलझाए रखना।
हालांकि बैठक के एजेंडे से अधिक चर्चा उसके स्थान को लेकर होती रही। स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारी यह समझने में जुटे रहे कि चिकित्सा शिक्षा और SHA की समीक्षा स्वास्थ्य महानिदेशालय में आयोजित करने के पीछे आखिर मंशा क्या थी। क्या यह केवल सुविधा का विषय था या फिर मंत्री ने विभागीय संरचना को लेकर कोई साइलेंट मैसेज देने की कोशिश की? क्या यह संकेत था कि आने वाले दिनों में स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय की अपेक्षा की जाएगी? या फिर यह उन अधिकारियों को संदेश था जो अपने-अपने विभागों की सीमाओं में रहकर काम करने के आदी हो चुके हैं?
राजनीति और नौकरशाही में कई बार संदेश शब्दों से नहीं, बल्कि मंच और व्यवस्था से दिए जाते हैं। छह घंटे की यह बैठक भी कुछ ऐसा ही संकेत छोड़ गई है। मंत्री ने एक ही छत के नीचे दोनों विभागों को बैठाकर न केवल उनकी कमियों का लेखा-जोखा लिया, बल्कि यह भी जता दिया कि अब विभागीय दीवारों के पीछे छिपने का दौर शायद खत्म होने वाला है।फिलहाल बैठक में लिए गए निर्णयों का असर आने वाले महीनों में दिखाई देगा, लेकिन इतना जरूर है कि स्वास्थ्य महानिदेशालय में हुई इस लंबी बैठक ने चिकित्सा शिक्षा, आयुष्मान योजना की कार्यशैली को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। और सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या यह सिर्फ समीक्षा बैठक थी या फिर सत्ता के गलियारों में भेजा गया एक बेहद सधा हुआ ‘साइलेंट मैसेज’?

