उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के संघर्ष के पीछे एक वजह क्राइम से मुक्ति भी थी। देहरादून हल्द्वानी कोटद्वार, उधमसिंहनगर जैसे मैदानी इलाकों में होते अपराध से पहाड़ी आबादी दहशतजदा थी। अपनी भाषा,अपनी बोली, अपनी पहचान, जल,जंगल, जमीन के सवालों के साथ साथ क्राइम भी मुद्दा था। पर तब आज जितना क्राइम नहीं था। अब तो हद हो गई है। खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है कि तर्ज पर मैदान से लेकर पहाड़ तक जुर्म जिंदा है।
देहरादून में बीते शुक्रवार जो वारदात हुई उसने दून पुलिस की मुस्तैदी का कच्चा चिट्ठा खोल दिया है। खाकी के कंधे कितने मजबूत है इसका खुलासा भी हो गया है। दरअसल बीती रात दून पुलिस की मुस्तैदी पर बेहिसाब ऐतबार करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर आकश कुमार अपनी शिप्ट खत्म कर आईटी पार्क से बाहर निकले और सहस्रधारा क्रासिंग पर अपने घर जाने के लिए अपनी बुक की हुई बाइक का इंतजार करने लगे।
इतने में दो बदमाश आए और अपने इरादों को अंजाम दे गए। बदमाशों ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर को जबरन अपने वाहन में बिठाया और सहस्रधारा क्रासिंग से लेकर घंटाघर, बिंदालपुल और गढ़ीकेंट होते हुए जामुनवाला तक ले गए जहां उनसे लूटपाट को अंजाम देने के बाद पुल के नीचे फेंक दिया। दून के लिहाज से ये वारदात मामूली क्राइम नहीं है। आम दूनवासी जिस्म में बहते लहू को सर्द करने वाली वारदात है।
हद है बदमाशों ने इतना लंबा सफर किया लेकिन पीड़ित इंजिनियर को किसी भी पुलिस पिकेट पर पुलिस नहीं दिखी।बदमाशों का हौसला देखिए सहस्रधारा क्रासिंग से जामुनवाला पुल तक उन्हें पुलिस का डर नहीं लगा। इससे साफ पता चल रहा है कि अपराधियों को मालूम है कि दून पुलिस की रगों का खून कितना गर्म है और दून पुलिस कितनी हरकत कर सकती है। ये वारदात बता रही है कि देहरादून की सड़कों पर अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हैं और उनके दिलो-दिमाग पर दून की खाकी का कोई खौंफ नहीं है।
अगर होता तो क्या आईटी पार्क में शिफ्ट खत्म कर घर जा रहे इंजीनियर को इतनी आसानी से अगुवा किया जा सकता था। साफ पता चल रहा है कि दून पुलिस न तो चौकस है और ना उसे अपनी जिम्मेदारियों का अहसास। बेरोजगारों को नौकरी मांगने पर बेहिसाब लाठियां भांजने वाली पुलिस को भी अब दून की वादियों में रात के अंधेरे से डर लगने लगा है। अगर ये बात सच नहीं है तो फिर पुलिस की पिकेट मे कोई जवान मुस्तैद क्यों नही था और अगर था, तो वो इतना बेखबर और लापरवाह क्यों रहा कि उसे अपराध की धमाचौकड़ी सुनाई ही नहीं दी।
जनाब, अगर मुजरिम यूं ही दहशदगर्दी मचाते रहे तो फिर दून वासी चैन की नींद कैसे सो पाएंगे? पुलिस वाले भैजी सॉफ्टवेयर इंजीनियर को दहशतगर्दों ने पुल से नीचे फेंका है गनीमत ये है कि मां-बाप के पुण्य प्रताप से उनका इंजीनियर बेटा चोटिल हुआ मगर जिंदा है। अगुवा करने वालों का इरादा तो उसे मौत की नींद सुलाने का था ताकि सुबूत ही मिट जाएं। फिर भी इंजीनियर की रीढ़ की हड्डी जख्मी हुई है। ऱीढ़ जख्मी होने का मतलब आप आसानी से समझते होंगे। हमारी दुआ तो ये है कि भगवान करे पीड़ित इंजीनियर ईलाज के बाद ठीक हो जाए।
लेकिन सवाल ये है कि जिस दून पुलिस को दूनवासियों की हिफाजत के लिए वर्दी और मोटी पगार दी जा रही है वो कब होश में आएंगे ? उसे अपने फर्ज का कब अहसास होगा, कब अपराधियों के हौंसले को कुचलने के लिए उसकी बाजुएं फड़फड़ाएंगी।

